अध्याय २१

यज्ञेश्वणर, देव यज्ञ के कारण, यज्ञों के स्वामी, गोविन्द भगवान्‌ को नमस्कार है। यह कह कर मन्त्रपुष्पाञ्जयलि समर्पण करे ॥ ४२ ॥

विश्वे्श्वरर, विश्वारूप, विश्वा के उत्पन्न करने वाले, विश्वस के स्वामी, नाथ, गोविन्द भगवान्‌ को नमस्कार है, नमस्कार है। यह कह कर नमस्कार समर्पण करे ॥ ४३ ॥

“मन्त्रहीनं क्रियाहीनं” इस मन्त्र से पुरुषोत्तम भगवान्‌ को क्षमापन समर्पण करके स्वाहान्त नाम मन्त्रों से प्रतिदिन तिल से हवन करे ॥ ४४ ॥

इति प्रदक्षिणाम्‌ ॥ यज्ञेश्वराय देवाय तथा यज्ञोद्भवाय च ॥ यज्ञानां पतये नाथ गोविन्दाय नमो नमः ॥ ४२ ॥

इति मन्त्रपुष्पम्‌ ॥ विश्वे्श्वथराय विश्वा य तथा विश्वोगद्भवाय च ॥ विश्व्स्य पतये तुभ्यं गोविन्दाय नमो नमः ॥ ४३ ॥

इति नमस्कारान्‌ ॥ मन्त्रहीनेति मन्त्रेण क्षमाप्य पुरुषोत्तमम्‌ ॥ स्वाहान्तैर्नाममन्त्रैश्च तिलहोमो दिने दिने ॥ ४४ ॥

दीपः कार्यस्त्वखण्डश्च यावन्मासं च सर्पिषा ॥ पुरुषोत्तमस्य प्रीत्यर्थं सर्वार्थफलसिद्धये ॥ ४५ ॥

यस्य स्मृत्येति मन्त्रेण नमस्कृत्य जनार्दनम्‌ ॥ यदूनं तत्तु सम्पूर्णं विधाय विचरेत्‌ सुखम्‌ ॥ ४६ ॥

पुरुषोत्तम मास पर्यन्त घृत का अखण्ड दीप समस्त फल की सिद्धि के लिये और पुरुषोत्तम भगवान्‌ के प्रीत्यर्थ समर्पण करे ॥ ४५ ॥

यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु॰। इस मन्त्र से जनार्दन भगवान्‌ को नमस्कार करके ‘प्रमादात्‌ कुर्वतां कर्म॰।’ इस मन्त्र से जो कुछ कमी रह गई हो उसको सम्पूर्ण करके सुख पूर्वक रहे ॥ ४६ ॥

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