अध्याय २२

पीपर, जीरा, सोंठ, इमली, सुपारी, लवली, आँवला, ईख का गुड़ छोड़ कर इन फलों को ॥ ७ ॥

और बिना तेल के पके हुए पदार्थ को हविष्य कहते हैं। हविष्य भोजन मनुष्यों को उपवास के समान कहा गया है ॥ ८ ॥

समस्त आमिष, माँस, शहद, बेर, राजमाषादिक, राई और मादक पदार्थ ॥ ९ ॥

पिप्पली जीरकं चैव नागरं चैव तिन्तिणी ॥ क्रमुकं लवली धात्री फलान्यगुडमैक्षवम्‌ ॥ ७ ॥

अतैलपक्वं मुनयो हविष्यं प्रवदन्ति च ॥ हविष्यभोजनं नॄणामुपवाससमं विदुः ॥ ८ ॥

सर्वामिषाणि मांसं च क्षौद्रं सौवीरकं तथा ॥ राजमासादिकं चैव राजिका मादकं तथा ॥ ९ ॥

द्विदलं तिलतैलं च तथान्नं शल्यदूषितम्‌ ॥ भावदुष्टं क्रियादुष्टं शब्ददुष्टं च वर्जयेत्‌ ॥ १० ॥

परान्नं  च परद्रोहं परदारागमं तथा ॥ तीर्थं विना प्रयाणं च परदेशं परित्यजेत्‌ ॥ ११ ॥

देववेदद्विजानां च गुरुगोव्रतिनां तथा ॥ स्त्रीराजमहतां निन्दां वर्जयेत्‌ पुरुषोत्तमे ॥ १२ ॥

दाल, तिल का तेल, लाह से दूषित, भाव से दूषित, क्रिया से दूषित, शब्द से दूषित, अन्न को त्याग करे ॥ १० ॥

दूसरे का अन्न, दूसरे से वैर, दूसरे की स्त्री से गमन, तीर्थ के बिना देशान्तर जाना व्रती छोड़ देवे ॥ ११ ॥

देवता, वेद, द्विज, गुरु, गौ, व्रती, स्त्री, राजा और महात्माओं की निन्दा करना पुरुषोत्तम मास में त्याग देवे ॥ १२ ॥

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