अध्याय २२

सूतिका का अन्न मांस है, फलों में जम्बीरी नीबू मांस है, धान्यों में मसूर की दाल मांस है और बासी अन्न मांस है ॥ १३ ॥

बकरी, गौ, भैंस के दूध को छोड़कर और सब दूध आदि मांस है। और ब्राह्मण से खरीदा हुआ समस्त रस, पृथिवी से उत्पन्नक नमक मांस है ॥ १४ ॥

ताँबे के पात्र में रखा हुआ दूध, चमड़े में रखा हुआ जल, अपने लिये पकाया गया अन्न  को विद्वानों ने मांस कहा है ॥ १५ ॥

प्राण्यन्नमामिषं चूर्णं फले जम्बीरमामिषम्‌ ॥ धान्ये मसूरिका प्रोक्ता अन्नं पर्युषितं तथा ॥ १३ ॥

अजागोमहिषोदुग्धादन्यद्‌दुग्धादि चामिषम्‌ ॥ द्विजक्रीता रसाः सर्वे लवणं भूमिजं तथा ॥ १४ ॥

ताम्रपात्रस्थितं गव्यं जलं चर्मणि संस्थितम्‌ ॥ आत्मार्थं पाचितं चान्नमामिषं तद्‌बुधैः स्मृतम्‌ ॥ १५ ॥

ब्रह्मचर्यमधःशय्यां पत्रावल्यां च भोजनम्‌ ॥ चतुर्थकाले भुक्तिं च प्रकुर्यात्‌ पुरुषोत्तमे ॥ १६ ॥

रजस्वलाऽन्त्यज-म्लेच्छ-पतितैर्व्रात्यकैःसह ॥ द्विजद्विट्‌-वेदबाह्यैश्च न वदेत्‌ पुरुषोत्तमे ॥ १७ ॥

एभिर्दृष्टं च काकैश्च सूतकान्नं् च यद्भवेत्‌ ॥ द्विःपाचितं च दग्धान्नंे नैवाद्यात्‌ पुरुषोत्तमे ॥ १८ ॥

पुरुषोत्तम मास में ब्रह्मचर्य, पृथिवी में शयन, पत्रावली में भोजन और दिन के चौथे पहर में भोजन करे ॥ १६ ॥

पुरुषोत्तम मास में रजस्वला स्त्री, अन्त्यज, म्लेच्छ, पतित, संस्कारहीन, ब्राह्मण से द्वेष करने वाला, वेद से गिरा हुआ, इनके साथ बातचीत न करे ॥ १७ ॥

इन लोगों से देखा गया और काक पक्षी से देखा गया, सूतक का अन्नच, दो बार पकाया हुआ और भूजे हुए अन्नो को पुरुषोत्तम मास में भोजन नहीं करे ॥ १८ ॥

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