अध्याय २२

व्रती कार्तिक और माघ मास में इन नियमों को करे। हे राजन्‌! व्रती नियम के बिना फलों को नहीं प्राप्त करता है ॥ २५ ॥

यदि शक्ति है तो उपवास करके पुरुषोत्तम का व्रत करे अथवा घृत पान करे अथवा दुग्ध पान करे अथवा बिना माँगे जो कुछ मिल जाय उसको भोजन करे ॥ २६ ॥

अथवा व्रत करनेवाला यथाशक्ति फलाहार आदि करे। जिसमें व्रत भंग न हो विद्वान्‌ इस तरह व्रत का नियम धारण करे ॥ २७ ॥

कुर्यादेतांश्च नियमान्‌ व्रती कार्तिकमाघयोः ॥ नियमेन विना राजन्‌ फलं नैवाप्नुयाद्‌व्रती ॥ २५ ॥

उपोषणेन कर्तव्यः शक्तिश्चेत्‌ पुरुषोत्तमः ॥ अथवा घृतपानं च पयःपानमयाचितम्‌ ॥ २६ ॥

फलाहारादि वा कार्यं यथाशक्त्या व्रतार्थिना ॥ व्रतभङ्गो यथा न स्यात्तथा कार्यं विचक्षणैः ॥ २७ ॥

पुण्येऽह्नि प्रातरुत्थाय कृत्वा पौर्वाह्णिकीः क्रियाः ॥ गृह्णीयान्नियमं भक्त्या श्रीकृष्णं च हृदि स्मरन्‌ ॥ २८ ॥

उपवासस्य नक्तस्य चैकभुक्तस्य भूपते ॥ एकं च निश्चयं कृत्वा व्रतमेतत्‌ समाचरेत्‌ ॥ २९ ॥

श्रीमद्भागवतं भक्त्या श्रोतव्यं पुरुषोत्तमे ॥ तत्पुण्यं वचसा वक्तुंी विधाताऽपि न शक्नुयात्‌ ॥ ३० ॥

पवित्र दिन प्रातःकाल उठ कर पूर्वाह्ण की क्रिया को करके भक्ति से श्रीकृष्ण भगवान्‌ का हृदय में स्मरण करता हुआ नियम को ग्रहण करे ॥ २८ ॥

हे भूपते! उपवास व्रत, नक्त व्रत और एकभुक्त इनमें से एक का निश्चय करके इस व्रत को करे ॥ २९ ॥

पुरुषोत्तम मास में भक्ति से श्रीमद्भागवत का श्रवण करे तो उस पुण्य को ब्रह्मा कभी कहने में समर्थ नहीं होंगे ॥ ३० ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7