अध्याय २२

श्रीपुरुषोत्तम मास में लाख तुलसीदल से शालग्राम का पूजन करे तो उसका अनन्त पुण्य होता है ॥ ३१ ॥

श्रीपुरुषोत्तम मास में कथनानुसार व्रत में स्थित व्रती को देख कर यमदूत सिंह को देख कर हाथी के समान भाग जाते हैं ॥ ३२ ॥

हे राजन्‌! यह पुरुषोत्तम मासव्रत सौ यज्ञों से भी श्रेष्ठ है क्योंकि यज्ञ के करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है और पुरुषोत्तम मासव्रत करने से गोलोक को जाता है ॥ ३३ ॥

शालिग्रामार्चनं कार्यं मासे श्रीपुरुषोत्तमे ॥ तुलसीदललक्षेण तस्य पुण्यमनन्तकम्‌ ॥ ३१ ॥

यथोक्तव्रतिनं दृष्ट्वा मासे श्रीपुरुषोत्तमे ॥ यमदूताः पलायन्ते सिंहं दृष्ट्वा यथा गजाः ॥ ३२ ॥

एतन्मासव्रतं राजन्‌ श्रेष्ठं क्रतुशतादपि ॥ क्रतुं कृत्वाऽऽनुयात्‌ स्वर्गं गोलोकं पुरुषोत्तमे ॥ ३३ ॥

पृथिव्यां यानि तीर्थानि क्षेत्राणि सर्वदेवताः ॥ तद्‌देहे तानि तिष्ठन्ति यः कुर्यात्‌ पुरुषोत्तमम्‌ ॥ ३४ ॥

दुःस्वप्नं चैव दारिद्रयं दुष्कृतं त्रिविधं च यत्‌ ॥ तत्सर्वं विलयं याति कृते श्रीपुरुषोत्तमे ॥ ३५ ॥

श्रीपुरुषोत्तमसेवायां निश्चलं हरिसेवकम्‌ ॥ विघ्नाद्रक्षन्ति शक्राद्याः पुरुषोत्तमतुष्टये ॥ ३६ ॥

जो पुरुषोत्तम मासव्रत करता है उसके शरीर में पृथ्वी के जो समस्त तीर्थ और क्षेत्र हैं तथा सम्पूर्ण देवता हैं वे सब निवास करते हैं ॥ ३४ ॥

श्रीपुरुषोत्तम मास का व्रत करने से दुःस्वप्न, दारिद्रय और कायिक, वाचिक, मानसिक पाप ये सब नाश को प्राप्त होते हैं ॥ ३५ ॥

पुरुषोत्तम भगवान्‌ की प्रसन्नता के लिये इन्द्रादि देवता, पुरुषोत्तम मासव्रत में तत्पर हरिभक्त की विघ्नों से रक्षा करते हैं ॥ ३६ ॥

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