अध्याय २३

दृढ़धन्वा राजा बोला – हे मुनियों में श्रेष्ठ! हे दीनों पर दया करने वाले! श्रीपुरुषोत्तम मास में दीप-दान का फल क्या है? सो कृपा करके मुझसे कहिये ॥ १ ॥

श्रीनारायण बोले – इस प्रकार राजा दृढ़धन्वा के पूछने पर अत्यन्त प्रसन्न, मुनियों में श्रेष्ठ बाल्मीकि मुनि ने हँसते हुए विनीत अत्यन्त नम्र राजा दृढ़धन्वा से कहा ॥ २ ॥

बाल्मीकि मुनि बोले – हे राजाओं में सिंहसदृश पराक्रमवाले! पापों का नाश करने वाली कथा को सुनिये जिसके सुनने से पाँच प्रकार के महान्‌ पाप नाश को प्राप्त होते हैं ॥ ३ ॥

राजोवाच ॥ किं फलं दीपदानस्य मासे श्रीपुरुषोत्तमे ॥ तन्मे वद मुनिश्रेष्ठ कृपया दीनवत्सल ॥ १ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इत्थं विज्ञापितः प्राह बाल्मीकिर्मुनिसत्तमः ॥ प्रवृद्धहर्षो राजानं विनीतं प्रहसन्निव ॥ २ ॥

बाल्मीकिरुवाच ॥ श्रृणुष्व राजशार्दूल कथां पापप्रणाशिनीम्‌ ॥ यां श्रुत्वा विलयं याति पापं पञ्चविधं महत्‌ ॥ ३ ॥

सौभाग्यनगरे राजा चित्रबाहुरिति श्रुतः ॥ सत्यसन्धो महाप्राज्ञश्चासीच्छूरतरः परः ॥ ४ ॥

सहिष्णुः सर्वधर्मज्ञः शीलरूपदयान्वितः ॥ ब्रह्मण्यो भगवद्भक्तः कथाश्रवणतत्परः ॥ ५ ॥

स्वदारनिरतः शश्वत्‌ पशुपुत्रसमन्वितः ॥ चतुरङ्गबलोपेतः समृद्धया धनदोपमः ॥ ६ ॥

सौभाग्य नगर में चित्रबाहु नाम से प्रसिद्ध, बड़ा बुद्धिमान्‌, अत्यन्त बलवान्‌ राजा था ॥ ४ ॥

वह क्षमाशील, समस्त धर्मों को जानने वाला, शील रूप और दया से युक्त, ब्राह्मणों का भक्त, भगवान्‌ का भक्त, कथा के श्रवण में तत्पर ॥ ५ ॥

हमेशा अपनी स्त्री में प्रेम करने वाला, पशु पुत्र से युक्त, चतुरंगिणी सेना से युक्त, ऐश्व॥र्य में कुबेर के समान था ॥ ६ ॥

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