अध्याय २३

देवता पितरों को तर्पण कर सुन्दर शीतल जल को पान कर उग्रदेव ब्राह्मण शीघ्र वट के मूल भाग में आकर बैठ गये ॥ ५५ ॥

पत्नी  सहित मणिग्रीव ने मुनिश्रेष्ठ उग्रदेव को नमस्कार किया और अतिथि सत्कार करने की इच्छा से विनययुक्त वाणी से बोला ॥ ५६ ॥

मणिग्रीव बोला – हे ब्रह्मन्‌! आज मुझको तारने के लिये आप मेरे आश्रम को आये। आपके दर्शन से मेरे पाप नष्ट हो गये ॥ ५७ ॥

देवान्‌ पितॄंश्च सन्तर्प्य पपौ नीरं सुशीतलम्‌ ॥ उग्रदेवस्ततः शीघ्रं वटमूलमुपाश्रितः ॥ ५५ ॥

मणिग्रीवः सपत्नीको ननाम मुनिसत्तमम्‌ ॥ विनयेनावदद्वाचमातिथ्यं कर्तुमुन्मनाः ॥ ५६ ॥

मणिग्रीव उवाच ॥ अस्मत्सन्तारणायाद्य मदाश्रममुपागतः ॥ ब्रह्मंस्त्वद्दर्शनादेव पापं मे विलयं गतम्‌ ॥ ५७ ॥

इत्युक्वा तं प्रियामाह मणिग्रीवो मुदान्वितः ॥ अयि सुन्दरि पक्कानि स्वादूनि यानि यानि च ॥ ५८ ॥

तानि चूतफलानि त्वं शीघ्रमानय मा चिरम्‌ ॥ अन्यत्कन्दादि यत्किञ्चित्तदानय शुभानने ॥ ५९ ॥

निजनाथवचः श्रुत्वा फलान्यादाय सुन्दरी ॥ कन्दादिकं च विप्राग्रे स्थापयामास हर्षतः ॥ ६० ॥

इस प्रकार उस ब्राह्मण से कह कर प्रसन्न मणिग्रीव स्त्री से बोला – अयि! सुन्दरी! जो जो स्वादिष्ट पके हुए फल हैं ॥ ५८ ॥

उन आम्रफलों को तुम जल्दी लाओ विलम्ब मत करो। हे शुभानने! और जो कुछ कन्द आदि हों उनको भी लाओ ॥ ५९ ॥

इस प्रकार स्त्री अपने पति के वचन को सुन फलों को और कन्दादिकों को लाकर हर्ष से ब्राह्मण के सामने रखती हुई ॥ ६० ॥

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