अध्याय २३

मणिग्रीव फिर मुनिश्रेष्ठ से वचन बोला कि हे ब्रह्मन्‌! इन फलों को ग्रहण कर मुझ स्त्री-पुरुष को कृतार्थ करें ॥ ६१ ॥

उग्रदेव ब्राह्मण बोला – तुमको मैं नहीं जानता हूँ। तुम कौन हो? सो मेरे से कहो। विद्वान्‌ ब्राह्मण को चाहिये कि अपरिचित का भोजन नहीं करे ॥ ६२ ॥

मणिग्रीव बोला – हे द्विजशार्दूल! मैं मणिग्रीव नामक शूद्र जाति का, स्वजनों से, जातिवालों से, अपने बान्धवों से त्यागा हुआ हूँ ॥ ६३ ॥

मणिग्रीवः पुनर्वाक्यमुवाच मुनिसत्तमम्‌ ॥ फलान्यङ्गीकुरु ब्रह्मन्‌ कृतार्थीकुरु दम्पती ॥ ६१ ॥

उग्रदेव उवाच ॥ त्वामहं नैव जानामि कस्त्वं भो कथयस्व मे ॥ अज्ञातस्य न भोक्तव्यं ब्राह्मणेन विजानता ॥ ६२ ॥

मणिग्रीव उवाच ॥ शूद्रोऽहं द्विजशार्दूल मणिग्रीवाभिधानतः ॥ स्वजनैर्जातिवर्गैश्चा परित्यक्तः स्वबान्धवैः ॥ ६३ ॥

इत्थं शूद्रवचः श्रुत्वा फलाहारमचीकरत्‌ ॥ उग्रदेवः प्रसन्नाशत्मा ततो नीरमपीपिबत्‌ ॥ ६४ ॥

ततो विप्रं सुखासीनं मणिग्रीवोऽवदद्वचः ॥ लालयंस्तत्पदाम्भोजं स्वक्रोडस्थं मुहुर्मुहुः ॥ ६५ ॥

मणिग्रीव उवाच ॥ क्व गन्तव्यं मुनिश्रेष्ठ कुतस्त्वं चेह कानने ॥ निर्जने निर्जले दुष्टे हिंस्रजन्तुसमाकुले ॥ ६६ ॥

इस प्रकार शूद्र के वचन को सुनकर प्रसन्नात्मा उग्रदेव ने फलों को खाया, बाद जल को पीया ॥ ६४ ॥

ब्राह्मण को सुख से बैठे देखकर मणिग्रीव उग्रदेव ब्राह्मण के पैरों को अपनी गोद में रख कर दबाता हुआ फिर वचन बोला ॥ ६५ ॥

मणिग्रीव बोला – हे मुनिश्रेष्ठ! आप कहाँ जायँगे? इस निर्जन जलरहित हिंसक जन्तुओं से भरे दुष्ट वन में कहाँ से आये? ॥ ६६ ॥

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