अध्याय २३

उग्रदेव बोला – हे महाभाग! मैं ब्राह्मण हूँ प्रयाग जाना चाहता हूँ। इस समय रास्ता न जानने के कारण भयंकर वन में चला आया हूँ॥ ६७ ॥

उस जगह थकावट और प्यास के कारण क्षणभर में ही मरणासन्नह हो गया। बाद तुमने मेरे को प्राण दिया। हे मणिग्रीव! बोलो, तुमको मैं क्या दूँ ॥ ६८ ॥

हे मणिग्रीव! तुम दोनों स्त्री-पुरुष ने किस दुःख के कारण वन में आश्रय लिया है। उस दुःख को मुझसे कहो मैं उस दुःख को दूर करूँगा ॥ ६९ ॥

उग्रदेव उवाच ॥ ब्राह्मणोऽहं महाभाग प्रयागं गन्तुमुत्सहे ॥ अधुनाऽज्ञातमार्गेण सम्प्राप्तो दारुणे वने ॥ ६७ ॥

तत्र श्रान्तस्तृषाक्रान्तो मुर्भूर्षुरभवं क्षणात्‌ ॥ जीवितं मे त्वया दत्तं ब्रूहि किं ते ददाम्यहम्‌ ॥ ६८ ॥

अरण्यं केन दुःखेन दम्पतीभ्यां समाश्रितम्‌ ॥ तद्‌दुःखमपनेष्यामि मणिग्रीव वदस्व मे ॥ ६९ ॥

अगस्त्य उवाच ॥ इत्युग्रदेववचनं ललितं निशम्य पत्न्याः  समक्षमनुनीय मुनीश्वरं तम्‌ ॥ दरिद्रयसागरतितीर्षुरसौ स्वकीयं वृत्तान्तमाह निजकर्मविपाकमुग्रम्‌ ॥ ७० ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे दृढधन्वोपाख्याने त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

अगस्त्य मुनि बोले – इस प्रकार उग्रदेव ब्राह्मण के वचन को सुनकर अपनी स्त्री के सामने उस मुनीश्वोर उग्रदेव की प्रार्थना कर दरिद्रता समुद्र को पार करने की इच्छा वाले मणिग्रीव ने अपने कर्म के भयंकर फलरूप वृत्तान्त को कहा ॥ ७० ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे दृढधन्वोपाख्याने त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

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