अध्याय २३

उसकी चन्द्रकला नाम की स्त्री चौंसठ कला को जानने वाली, पतिव्रता, महान्‌ भाग्यवती, भगवान्‌ की भक्ति को करने वाली थी ॥ ७ ॥

उसके साथ युवा चित्रबाहु राजा पृथ्वी का भोग करने लगा। बिना श्रीकृष्ण के दूसरे देवता को नहीं जानता था ॥ ८ ॥

एक दिन पृथिवीपति राजा चित्रबाहु ने दूर से ही आये हुए मुनियों में श्रेष्ठ अगस्त्य मुनि को देख कर ॥ ९ ॥

तस्य भार्या चन्द्रकला चतुःषष्टिकलान्विता ॥ पतिव्रता महाभागा भगवद्भक्तिसंयुता ॥ ७ ॥

तया सह महीपालो बुभुजे मेदिनीं युवा ॥ विना श्रीकृष्णदें स नैव जानाति दैवतम्‌ ॥ ८ ॥

एकस्मिन्दिवसे राजा चित्रबाहुर्महीपतिः ॥ दृष्ट्वा समागतं दूरादगस्त्यं मुनिपङ्गवम्‌ ॥ ९ ॥

प्रणम्य दण्डवद्भूमौ विधिना तमपूजयत्‌ ॥ कल्पयित्वाऽऽसनं भक्त्या तस्थौ मुनिवराग्रतः ॥ १० ॥

विनयावनतो भूत्वा जगाद मुनिसत्तमम्‌ ॥ राजोवाच ॥ अद्य मे सफलं जन्म ह्यद्य मे सफलं दिनम्‌ ॥ ११॥

अद्य में सफलं राज्यमद्य में सफलं गृहम्‌ ॥ यस्त्वं समागतो मेऽद्य गृहे श्रीकृष्णसेवकः ॥ १२ ॥

पृथिवी में दण्डवत्‌ प्रणाम कर उनकी विधिपूर्वक पूजा की। और भक्ति से आसन देकर मुनिश्रेष्ठ के सम्मुख बैठ गया ॥ १० ॥

विनय से नम्र होकर मुनिश्रेष्ठ से कहा। राजा बोला – आज मेरा जन्म सफल हुआ, आज मेरा दिन सफल हुआ ॥ ११ ॥

आज मेरा राज्य सफल हुआ, आज मेरा गृह सफल हुआ जो आप श्रीकृष्णचन्द्र के सेवक आज मेरे गृह में आये हैं ॥ १२ ॥

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