अध्याय २३

आपसे देखा गया मैं तापपुञ्जष से मुक्त हो गया। आपको हाथी घोड़े रथ से युक्त समस्त राज्य समर्पण किया ॥ १३ ॥

हे मुनिश्रेष्ठ! आप वैष्णव हो, आपके लिये कोई भी अदेय वस्तु नहीं है। वैष्णव को थोड़ा भी दिया हुआ मेरु पर्वत के समान होता है ॥ १४ ॥

जो कौड़ी के बराबर शाक अथवा उत्तम अन्न जिस दिन वैष्णव ब्राह्मण को नहीं देता है ॥ १५ ॥

मुक्तोऽहं पापसङ्घाताद्यत्त्वयाऽहं निरीक्षितः ॥ तुभ्यं समर्पितं राज्यं गजाश्वरथसंयुतम्‌ ॥ १३ ॥

वैष्णवोऽसि मुनिश्रेष्ठ नास्त्यदेयं मया तव ॥ मेरुतुल्यं भवेत्‌ स्वल्पं वैष्णवाय समर्पितम्‌ ॥ १४ ॥

कपर्दिकाप्रमाणं तु व्यञ्जनं वान्नमुत्तम्‌ ॥ न यच्छति दिने यस्तु वैष्णवाय द्विजन्मने ॥ १५ ॥

तद्दिनं विफलं तस्य कथितं वेदपारगैः ॥ विष्णुभक्ताश्च ये केचित्‌ सर्वे पूज्या द्विजातयः ॥ १६ ॥

तेषां सम्भावना कार्या वाङ्मनः कायकर्मभिः ॥ कथितं मम गर्गेण गौतमेन सुमन्तुना ॥ १७ ॥

तावत्प्रभा च ताराणां यावन्नोदयते रविः ॥ तावदन्ये द्विजन्मानो यावन्नायाति वैष्णवः ॥ १८ ॥

वह दिन उसका विफल है, ऐसा वेद के जाननेवालों ने कहा है। जो कोई द्विजाति विष्णुभक्त हों वे सब पूज्य हैं ॥ १६ ॥

उनका वाणी मन कर्म से सत्कार करना चाहिये। ऐसा मुझसे गर्ग, गौतम, सुमन्तु, ऋषि ने कहा है ॥ १७ ॥

जब तक सूर्योदय नहीं होता है तभी तक तारागण की प्रभा रहती है। जब तक वैष्णव ब्राह्मण नहीं आता है, तभी तक दूसरे ब्राह्मण कहे गये हैं ॥ १८ ॥

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