अध्याय २३

अगस्त्य मुनि बोले – हे चित्रबाहो! हे महाभाग! हे नृप इस समय तुम धन्य हो, ये सब प्रजा धन्य हैं जो तुम वैष्णवों की रक्षा करते हो ॥ १९ ॥

जो राज्य वैष्णव का नहीं हो उसके राज्य में वास नहीं करना। शून्य वन में वास करना अच्छा है, परन्तु अवैष्णव के राज्य में रहना अच्छा नहीं है ॥ २० ॥

जिस प्रकार नेत्रहीन शरीर, पतिहीन स्त्री, बिना पढ़ा हुआ ब्राह्मण निन्द्य है वैसे ही वैष्णव रहित देश निन्द्य है ॥ २१ ॥

अगस्त्य उवाच ॥ चित्रबाहो महाभाग धन्यस्त्वं साम्प्रतं नृप ॥ इमा धन्याः प्रजाः सर्वा यस्त्वं रक्षसि वैष्णवम्‌ ॥ १९ ॥

तस्मिन्‌ राष्ट्रे न वस्तव्यं यस्य राजा न वैष्णवः ॥ वरो वासो वने शून्ये न तु राष्ट्रेव ह्यवैष्णवे ॥ २० ॥

चक्षुर्हीनो यथा देहः पतिहीना यथा प्रिया ॥ निरक्षरो यथा विप्रस्तथा राष्ट्रमवैष्णवम्‌ ॥ २१ ॥

दन्तहीनो यथा हस्ती पक्षहीनो यथा खगः ॥ द्वादशी दशमीविद्धा तथा राष्ट्रमवैष्णवम्‌ ॥ २२ ॥

दर्भहीना यथा सन्ध्या तिलहीनं च तर्पणम्‌ ॥ वृत्त्यर्थं देवसेवा च तथा राष्ट्रमवैष्णवम्‌ ॥ २३ ॥

सकेशा विधवा यद्वद्‌व्रतं स्ना‌नविवजितम्‌ ॥ शूद्रश्च ब्राह्मणीगामी तथा राष्ट्रमवैष्णवम्‌ ॥ २४ ॥

जैसे दाँत के बिना हाथी, पंख के बिना पक्षी, दशमीविद्धा द्वादशी (एकादशी) कही गई है वैसे ही वैष्णव रहित देश है ॥ २२ ॥

जैसे कुशा रहित सन्ध्या, तिलहीन तर्पण, वृत्ति के लिये देवता की सेवा है वैसे ही वैष्णव रहित देश कहा है ॥ २३ ॥

जैसे केशों को धारण करनेवाली विधवा स्त्री, स्नान रहित व्रत, ब्राह्मणी में गमन करनेवाला शूद्र है वैसे ही बिना वैष्णव का राष्ट्र निन्द्य है ॥ २४ ॥

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