अध्याय २३

जो श्रीकृष्णचन्द्र के चरणों का आश्रय करने वाला है सत्पुरुषों से राजा कहा गया है उसका राष्ट्र हमेशा वृद्धि को प्राप्त होता है और उसकी प्रजा सुखी होती है ॥ २५ ॥

हे राजन्‌! जो मैंने तुमको देखा इसलिए मेरी दृष्टि सफल हुई। भगवद्भक्त आपके साथ बात करने से आज मेरी वाणी सफल हुई ॥ २६ ॥

हे राजन्‌! मेरी आज्ञा से यह राज्य तुमको करना चाहिए। मैंने इस राज्य में तुमको प्रतिष्ठित किया। तुम्हारा कल्याण हो मैं जाऊँगा ॥ २७ ॥

स राजा प्रोच्यते सद्भिर्यः श्रीकृष्णपदाश्रयः ॥ तद्राष्ट्रं वर्धते नित्यं सुखी भवति तत्प्रजा ॥ २५ ॥

दृष्टिर्मे सफला राजन्‌ यन्मया त्वं निरीक्षतः ॥ अद्य मे सफला वाणी ह्यच्युते यत्त्वा सह॥ २६ ॥

इदं राज्यं त्वया राजन्‌ प्रकर्त्तव्यं ममाज्ञया ॥ प्रतिष्ठितो मया राज्ये गमिष्याम्यस्तु स्वस्ति ते ॥ २७ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इत्युक्त्या गन्तुकामं तमगत्स्यं मुनिपुङ्गवम्‌ ॥ ननाम परया भक्त्या महिषी सा पतिव्रता ॥ २८ ॥

अगस्त्य उवाच ॥ अवैधव्यं सदा तेऽस्तु भक्त्या भज पतिं शुभे ॥ दृढा तेऽस्तु सदा भक्तिः श्रीगोपीजनवल्लभे ॥ २९ ॥

इत्थमाशीर्ददानं तं भूयः प्राह महीपतिः ॥ बद्धाञ्जशलिपुटो भूत्वा विनयानतकन्धरः ॥ ३० ॥

श्रीनारायण बोले – इस प्रकार कह कर जाने की इच्छा करनेवाले श्रेष्ठ मुनि अगस्त्य को चित्रबाहु राजा की पतिव्रता स्त्री ने परमभक्ति के साथ प्रणाम किया ॥ २८ ॥

अगस्त्य मुनि बोले – हे शुभे! तू सदा सौभाग्यवती हो और भक्ति से पति की सेवा कर। श्रीगोपीजन के वल्लरभ श्रीकृष्णचन्द्र में तेरी सदा दृढ़ भक्ति हो ॥ २९ ॥

इस प्रकार आशीर्वाद देते हुए अगस्त्य ऋषि से विनयपूर्वक शिर नवा कर और अञ्ज लि बाँध कर चित्रबाहु राजा ने फिर कहा ॥ ३० ॥

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