अध्याय २३

चित्रबाहु बोला – हे विप्रेन्द्र! यह विपुल लक्ष्मी कैसे हुई? निष्कण्टक राज्य कैसे हुआ? यह मेरी स्त्री इतनी पतिव्रता कैसे हुई? और मैंने कौन-सा पुण्य किया था? ॥ ३१ ॥

हे विप्रेन्द्र! यह सब मेरे से आप कहिए। मैं आपकी शरण में आया हूँ। हे मुनीश्वर! आप हाथ में स्थित दर्पण के समान सब जानते हो ॥ ३२ ॥

श्रीनारायण बोले – इस प्रकार राजा चित्रबाहु के कहने पर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य एकाग्रचित्त होकर राजश्रेष्ठ चित्रबाहु से बोले ॥ ३३ ॥

चित्रबाहुरुवाच ॥ विपुला मे कथं लक्ष्मीः कथं राज्यमकण्टकम्‌ ॥ पतिव्रता कथं पत्नी किं कृतं सुकृतं मया ॥ ३१ ॥

एतन्मे ब्रूहि विप्रेन्द्र तवाहं शरणं गतः ॥ करामलकवत्सर्वं जानासि त्वं मुनीश्वर ॥ ३२ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इत्थमावेदितो राज्ञा ह्यगस्त्यो मुनिपुङ्गवः ॥ समाहितमना भूत्वा जगाद नृपसत्तमम्‌ ॥ ३३ ॥

अगस्त्य उवाच ॥ मया विलोकितं सर्वं प्राक्तनं चरितं तव ॥ तत्सर्वं कथयाम्यद्य सेतिहासं पुरातनम्‌ ॥ ३४ ॥

चमत्कारपुरे रम्ये मणिग्रीवाभिधानभृत्‌ ॥ त्वमभूः शूद्रजातीयो जीवहिंसापरायणः ॥ ३५ ॥

नास्तिको दुष्टचारित्रः परदारप्रधर्षकः ॥ कृतध्नो दुर्विनीतश्च शिष्टाचारविवर्जितः ॥ ३६ ॥

अगस्त्य मुनि बोले – हे राजन्‌! मैंने तुम्हारे पूर्वजन्म का चरित्र देख लिया है। इतिहास के सहित प्राचीन उस चरित्र को कहता हूँ ॥ ३४ ॥

सुन्दर चमत्कार पुर में शूद्र जाति में जीव हिंसा करने में तत्पर मणिग्रीव कामधारी तुम हुए ॥ ३५ ॥

सो तुम नास्तिक, दुष्टचरित्र वाले, दूसरे की स्त्री को हरण करनेवाले, कृतध्न, दुर्विनीत, शिष्टाचार से रहित हुए ॥ ३६ ॥

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