अध्याय २३

और तुम्हारी यह जो स्त्री है यही पूर्व जन्म में भी स्त्री थी। यह कर्म, मन और वचन से पतिसेवा में परायण थी ॥ ३७ ॥

पतिव्रता, महाभागा, धर्म में प्रेम करनेवाली, मनस्विनी इसने कभी भी तुम्हारे विषय में दुष्टभाव नहीं किया ॥ ३८ ॥

पापकर्म को करनेवाले तुम्हारा जाति और बान्धवों ने त्याग कर दिया और क्रुद्ध होकर राजा ने सब उत्तम धन ले लिया ॥ ३९ ॥

या चेयं भवतो भार्या पूर्वजन्मनि सुन्दरी ॥ कर्मणा मनसा वाचा पतिसेवापरायणा ॥ ३७ ॥

पतिव्रता महाभागा धर्मनिष्ठा मनस्विनी ॥ भावं न कुरुते दुष्टं तवोपरि कदाचन ॥ ३८ ॥

ज्ञातिभिस्त्वं परित्यक्तो बन्धुभिः पापकर्मकृत्‌ ॥ राज्ञा क्रुद्धेन ते सर्वं गृहीतं धनमुत्तमम्‌ ॥ ३९ ॥

ततोऽवशिष्टं यत्‌ किञ्चिद्‌ गृहीतं ज्ञातिभिस्तदा ॥ गते द्रव्ये धनाकाङ्क्षा तवाऽऽसीद्विपुला तदा ॥ ४० ॥

क्षीयमाणे धने साध्वी न त्वामत्यजदुन्मनाः ॥ एवं तिरस्कृतः सर्वैर्गतवान्निर्जनं वनम्‌ ॥ ४१ ॥

हत्वा जीवाननेकांश्च त्वं चकर्थात्मपोषणम्‌ ॥ एवं वर्तयतस्तस्य पत्न्या् सह महीपते ॥ ४२ ॥

फिर उस समय बचा हुआ जो कुछ अवशेष धन था उसको जातिवालों ने भी लिया। तब उस समय धन के चले जाने से तुमको धन की भारी इच्छा हुई ॥ ४० ॥

परन्तु धन के नाश होने पर भी मन मलीन होकर इस पतिव्रता ने तुम्हारा त्याग नहीं किया। इस प्रकार सब लोगों से तिरस्कृत होने पर तुम निर्जन वन को गये ॥ ४१ ॥

हे महीपते! वन में जाकर अनेक पशुओं को मारकर अपनी आत्मा का रक्षण किया। इस प्रकार स्त्री के सहित जीवन निर्वाह करते हुए ॥ ४२ ॥

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