अध्याय २३

धनुष को उठाकर मणिग्रीव मृग के मांस को खाने की इच्छा से बहुत से सर्प और मृग से भरे हुए वन को गया ॥ ४३ ॥

उस मनुष्यरहित वन के मध्य मार्ग में उग्रदेव नाम के महामुनि दिशाज्ञान के नष्ट हो जाने से व्याकुल हो गये ॥ ४४ ॥

हे राजन्‌! मध्याह्न के समय तृषा से अत्यन्त पीड़ित हो वहाँ ही गिरकर मरणासन्न हो गये। उस समय ॥ ४५ ॥

एकदा धनुरुद्यम्य मणिग्रीवो वनं गतः ॥ बहुव्यालमृगाकीर्णं मृगमांसजिघृक्षया ॥ ४३ ॥

तस्मिन्निर्मानुषेऽरण्ये मध्ये मार्गं महामुनिः ॥ उग्रदेव इतिख्यातो दिङ्‌मूढो विह्वलोऽभवत्‌ ॥ ४४ ॥

तृषा सम्पीडितोऽत्यर्थं मध्यन्दिनगते रवौ ॥ तत्रैव पतितो राजन्‌ मुमूर्षुरभवत्तदा ॥ ४५ ॥

तं दृष्ट्वा ते दया जाता दिग्भ्रष्टं  दुःखितं द्विजम्‌ ॥ उत्थाप्य तं द्विजन्मानं गृहीत्वा स्वाश्रमं गतः ॥ ४६ ॥

दम्पतिभ्यां कृता सेवा दुःखितस्य द्विजन्मनः ॥ उग्रदेवो महायोगी मुहूर्तानन्तरं तदा ॥ ४७ ॥

अवाप्य चेतनां यत्र विस्मयं समजीगमत्‌‌ ॥ तत्रास्थोऽयं कुतश्चात्र केनानीतो वनान्तरम्‌ ॥ ४८ ॥

रास्ते को भूले हुए उस दुःखित ब्राह्मण को देख कर तुमको दया आई। बाद उस ब्राह्मण को उठाकर और उसको साथ लेकर तुम अपने आश्रम को गये ॥ ४६ ॥

उस दुःखित ब्राह्मण की तुम दोनों स्त्री-पुरुष ने सेवा की। एक मुहूर्त के बाद उस समय महायोगी उग्रदेव ॥ ४७ ॥

चैतन्यता को प्राप्त हो आश्चर्य करने लगे कि मैं वहाँ था यहाँ कैसे आ गया? उस वन के बीच से कौन लाया? ॥ ४८ ॥

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