अध्याय २३

श्रीनारायण बोले – मणिग्रीव ने उस ब्राह्मण से कहा कि यह सुन्दर तालाब है इसमें कमलिनी के पुष्प से सुगन्धित शीतल जल है ॥ ४९ ॥

हे ब्रह्मन्‌! उस शीतल जल में स्नान करके मध्याह्न की क्रिया करके फलाहार करें और सुन्दर शीतल जल का पान करें ॥ ५० ॥

इस समय मैंने रक्षा की है। आप सुख से विश्राम करें। हे मुनिश्रेष्ठ! आप उठिये और आप कृपा करने के योग्य हैं ॥ ५१ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ मणिग्रीवोऽवदद्विप्रं रमणीयमिदं सरः ॥ अत्रास्ते शीतलं वारि पद्मिनीपुष्पवासितम्‌ ॥ ४९ ॥

तत्र स्नात्वा जले शीते कृत्वा पौर्वाह्निकीः क्रियाः ॥ कुरु ब्रह्मन्‌ फलाहारं पिब वारि सुशीतलम्‌ ॥ ५० ॥

सुखेन कुरु विश्रामं मया संरक्षितोऽधुना ॥ उत्तिष्ठ त्वं मुनिश्रेष्ठ प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ ५१ ॥

अगस्त्य उवाच ॥ लब्धसंज्ञस्तदा विप्र उग्रदेवो गतश्रमः ॥ मणिग्रीववचः श्रुत्वा समुत्तस्थौ तृषातुरः ॥ ५२ ॥

मणिग्रीवभुजालम्बी जगाम सरसीतटम्‌ ॥ उपविष्टश्चित्रबाहो तत्तटे वटशोभिते ॥ ५३ ॥

विश्रम्य तत्क्षणं विप्रो वटच्छायामधिश्रितः ॥ स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा वासुदेवमपूजयत्‌ ॥ ५४ ॥

अगस्त्यजी बोले – उस समय उग्रदेव ब्राह्मण श्रमरहित सावधान हो मणिग्रीव का वचन सुन कर तृषा से व्याकुल हो उठा ॥ ५२ ॥

हे चित्रबाहो! मणिग्रीव की भुजा पकड़ कर वट-वृक्ष से शोभित तालाब के तट पर जाकर बैठ गये ॥ ५३ ॥

वट की छाया में बैठकर क्षणमात्र विश्राम कर स्नान और नित्यकर्म कर वासुदेव भगवान्‌ का पूजन किया ॥ ५४ ॥

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