अध्याय २४

मणिग्रीव बोला – हे द्विज! विद्वानों से पूर्ण और सुन्दर चमत्कारपुर में धर्मपत्नी के साथ में रहता था ॥ १ ॥

धनाढय, पवित्र आचरण वाला, परोपकार में तत्पर मुझको किसी समय संयोग से दुष्ट बुद्धि पैदा हुई ॥ २ ॥

दुष्ट बुद्धि के कारण मैंने अपने धर्म का त्याग किया, दूसरे की स्त्री का सेवन किया और नित्य अपेय वस्तु का पान किया ॥ ३ ॥

मणिग्रीव उवाच ॥ चमत्कारपुरे रम्ये विद्वज्जनसमाकुले ॥ मम वासोऽभवत्तत्र धर्मपत्न्याक सह द्विज ॥ १ ॥

धनाढयस्य पवित्रस्य परोपकृतिशालिनः ॥ कदाचिद्‌दैवयोगेन दुर्बुद्धिः समपद्यत ॥ २ ॥

निजधर्मपरित्यागः कृता मे दुष्टबुद्धिना ॥ परस्त्रीसेवनं नित्यमपेयं पीयते स्म ह ॥ ३ ॥

चौर्यहिंसापरश्चाहं परित्यक्तः स्वबन्धुभिः ॥ बृहद्‌बलेन भूपेन मद्‌गृहं लुण्ठितं तदा ॥ ४ ॥

अवशिष्टंस च यत्किञ्चिद्‌ गृहीतं बन्धुभिर्धनम्‌ ॥ एवं तिरस्कृतः सर्वैर्वनवासमचीकरम्‌ ॥ ५ ॥

कृत्वा जीववधं नित्यं जीवेयं भार्यया सह ॥ एतस्मिन्विपिने घोरे वसतो मे दुरात्मनः ॥ ६ ॥

चोरी हिंसा में तत्पर रहता था, इसलिए बन्धुओं ने मेरा त्याग किया। उस समय महाबलवान्‌ राजा ने मेरा घर लूट लिया ॥ ४ ॥

बाद बचा हुआ जो कुछ धन था उसको बन्धुओं ने ले लिया। इस प्रकार सभी से तिरस्कृत होने के कारण वन में निवास किया ॥ ५ ॥

स्त्री के साथ इस घोर वन में निवास करते हुए मुझ दुरात्मा का नित्य जीवों का वध कर जीवन-निर्वाह होता है ॥ ६ ॥

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