अध्याय २४

हे ब्रह्मन्‌! इस समय आप मुझ पातकी पर अनुग्रह करें। प्राचीन पुण्य के समूह से आप इस घोर वन में आये हैं ॥ ७ ॥

हे महामुने! स्त्री के साथ मैं आपकी शरण में आया हूँ। आप उपदेशरूप प्रसाद से कृतार्थ करने के योग्य हैं ॥ ८ ॥

जिस उपाय के करने से मेरी तीव्र दरिद्रता इसी क्षण में नष्ट हो जाय और अतुल वैभव को प्राप्त कर यथासुख विचरूँ ॥ ९ ॥

कुरुष्वानुग्रहं ब्रह्मन्‌ पापयुक्तस्य साम्प्रतम्‌ ॥ प्राचीनपुण्यपुञ्जेुन सम्प्राप्तो गहने भवान्‌ ॥ ७ ॥

तवाहं शरणं यातः सपत्नीको महामुने ॥ उपदेशप्रसादेन कृतार्थीकर्तुमर्हसि ॥ ८ ॥

येन मे तीव्रदारिद्रयं विलयं याति तत्क्षणात्‌ ॥ अतुलं वैभवं लब्ध्वा विचरामि यथासुखम्‌ ॥ ९ ॥

उग्रदेव उवाच ॥ कृतार्थोऽसि महाभाग यदातिथ्यं कृतं मम ॥ अतस्ते भावि कल्याणं सपत्नीकस्य साम्प्रतम्‌ ॥ १० ॥

विना व्रतैर्विना तीर्थैर्विना दानैरयत्नतः ॥ दारिद्रयं ते लयं याति यथा निर्धारितं मया ॥ ११ ॥

अतः परं तृतीयोऽस्ति मासः श्रीपुरुषोत्तमः ॥ भवद्भयां तत्र विधिना दम्पतीभ्यां प्रयत्न तः ॥ १२ ॥

उग्रदेव बोला – हे महाभाग! तुम कृतार्थ हो गये। जो तुमने मेरा अतिथि-सत्कार किया इसलिए इस समय स्त्रीसहित तुमको होनेवाले कल्याण को कहता हूँ ॥ १० ॥

जो बिना व्रत के, बिना तीर्थ के, बिना दान के, बिना प्रयास के तुम्हारी दरिद्रता दूर हो जायगी, ऐसा मैंने विचार किया है ॥ ११ ॥

इसके बाद तीसरा श्रीपुरुषोत्तम मास आने वाला है उस पुरुषोत्तम मास में सावधानी के साथ विधिपूर्वक तुम दोनों स्त्री-पुरुष ॥ १२ ॥

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