अध्याय २४

श्रीपुरुषोत्तम भगवान्‌ को प्रसन्न करने के लिये दीप-दान करना। उस दीप-दान से तुम्हारी यह दरिद्रता जड़ से नष्ट हो जायगी ॥ १३ ॥

तिल के तेल से दीप-दान करना चाहिये। विभव के होने पर घृत से दीप-दान करना चाहिये। परन्तु इस समय वन में वास करने के कारण घृत अथवा तेल इनमें से तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है ॥ १४ ॥

हे अनघ! मणिग्रीव! पुरुषोत्तम मास भर स्त्री के साथ नियमपूर्वक इंगुदी के तेल से तुम दीप-दान करना ॥ १५ ॥

कर्तव्यं दीपदानं च पुरुषोत्तमतुष्टये ॥ तेन ते तीव्रदारिद्रयं समूलं नाशमेष्यति ॥ १३ ॥

तिलतैलेन कर्तव्यः सर्पिषा वैभवे सति ॥ तयोर्मध्ये न किञ्चित्ते कानने वसतोऽधुना ॥ १४ ॥

इङ्‌गुदीजेन तैलेन दीपः कार्यस्त्वयाऽनघ ॥ यावन्मासं सनियमं मणिग्रीव स्त्रिया सह ॥ १५ ॥

अस्मिन्सरोवरे स्नात्वा सह पत्न्याव निरन्तरम्‌ ॥ एवमेव हि कर्तव्यं मासमात्रं त्वया वने ॥ १६ ॥

अयमेवोपदेशस्तु सपत्नी्काय मे कृतः ॥ त्वादातिथ्यप्रसन्नेन मया निगमनिश्चितः ॥ १७ ॥

अवैधं दीपदानं हि रमावृद्धिकरं नृणाम्‌ ॥ विधिना कियमाणं चेत्किं पुनः पुरुषोत्तमे ॥ १८ ॥

स्त्री के साथ इस तालाब में नित्य स्नान करके दीप-दान करना। इसी प्रकार तुम इस वन में एक मास व्रत करना ॥ १६ ॥

तुम्हारे अतिथिसत्कार से प्रसन्न मैंने यह वेद में कहा हुआ तुम दोनों स्त्री-पुरुष के लिये उपदेश किया है ॥ १७ ॥

विधिहीन भी दीप-दान करने से मनुष्यों को लक्ष्मी की वृद्धि होती है। यदि पुरुषोत्तम मास में विधिपूर्वक दीप-दान किया जाय तो क्या कहना है ॥ १८ ॥

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