अध्याय २४

वेद में कहे हुए कर्म और अनेक प्रकार के दान पुरुषोत्तम मास में दीप-दान की सोलहवीं कला की भी बराबरी नहीं कर सकते हैं ॥ १९ ॥

समस्त तीर्थ, समस्त शास्त्र पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला को नहीं पा सकते हैं ॥ २० ॥

योग, दान, सांखय, समस्त-तन्त्र भी पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला को नहीं पा सकते हैं ॥ २१ ॥

वेदोक्तानि च कर्माणि दानानि विविधानि च ॥ पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्‌ ॥ १९ ॥

तीर्थानि सकलान्येव शास्त्राणि सकलानि च ॥ पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्‌ ॥ २० ॥

योगो ज्ञानं तथा साङ्‌ख्यं तन्त्राणि सकलान्यपि ॥ पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्‌ ॥ २१ ॥

कृच्छ्रचान्द्रायणादीनि व्रतानि निखिलानि च ॥ पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्‌ ॥ २२ ॥

वेदाभ्यासो गयाश्राद्धं गोमतीतटसेवनम्‌ ॥ पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्‌ ॥ २३ ॥

उपरागसहस्राणि व्यतीपातशतानि च ॥ पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्‌ ॥ २४ ॥

कृच्छ्र, चान्द्रायण आदि समस्त व्रत पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला की बराबरी नहीं कर सकते हैं ॥ २२ ॥

वेद का प्रतिदिन पाठ करना, गयाश्राद्ध, गोमती नदी के तट का सेवन पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला की बराबरी नहीं कर सकते ॥ २३ ॥

हजारों ग्रहण, सैकड़ों व्यतीपात पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला की बराबरी नहीं कर सकते हैं ॥ २४ ॥

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