अध्याय २४

कुरुक्षेत्र आदि श्रेष्ठ क्षेत्र, दण्डक आदि वन पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला की बराबरी नहीं कर सकते हैं ॥ २५ ॥

हे वत्स! यह अत्यन्त गुप्त व्रत जिस किसी से कहने लायक नहीं है। यह धन, धान्य, पशु, पुत्र, पौत्र और यश को करनेवाला है ॥ २६ ॥

वन्ध्या स्त्री के बाँझपन को नाश करनेवाला है और स्त्रियों को सौभाग्य देनेवाला है। राज्य से गिरे हुए राजा को राज्य देनेवाला है और प्राणियों को इच्छानुसार फल देनेवाला है ॥ २७ ॥

कुर्वादिक्षेत्रवर्याणि दण्डकादिवनानि च ॥ पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्‌ ॥ २५ ॥

एतद्‌गुह्यतमं वत्स नाख्येयं यस्य कस्यचित्‌ ॥ धनधान्यपशुव्रातपुत्रपौत्रयशस्करम्‌ ॥ २६ ॥

वन्ध्यावन्ध्यत्वशमनमवैधव्यकरं स्त्रियाः ॥ राज्यदं राज्यभ्रष्टस्य चिन्तितार्थकरं नृणाम्‌ ॥ २७ ॥

कन्या विन्देत भर्त्तारं गुणिनं चिरजीविनम्‌ ॥ कान्तार्थी लभते कान्तां सुशीलां च पतिव्रताम्‌ ॥ २८ ॥

विद्यार्थी लभते विद्यां सुसिद्धिं सिद्धिकामुकः ॥ कोशकामो लभेत्‌ कोशं मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात्‌ ॥ २९ ॥

विना विधिं विना शास्त्रं यः कुर्यात्‌ पुरुषोत्तमे ॥ दीपं तु यत्र कुत्रापि कामितं सर्वमाप्नुयात्‌ ॥ ३० ॥

यदि कन्या व्रत करती है तो गुणी चिरञ्जीयवी पति को प्राप्त करती है, स्त्री की इच्छा करने वाला पुरुष सुशीला और पतिव्रता स्त्री को प्राप्त करता है ॥ २८ ॥

विद्यार्थी विद्या को प्राप्त करता है। सिद्धि को चाहने वाला अच्छी तरह सिद्धि को प्राप्त करता है। खजाना को चाहने वाला खजाना को प्राप्त करता है। मोक्ष को चाहने वाला मोक्ष को प्राप्त करता है ॥ २९ ॥

बिना विधि के, बिना शास्त्र के जो पुरुषोत्तम मास में जिस किसी जगह दीप-दान करता है वह इच्छानुसार फल को प्राप्त करता है ॥ ३० ॥

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