अध्याय २४

हे वत्स! विधिपूर्वक नियम से जो दीप-दान करता है तो फिर कहना ही क्या है? इसलिये पुरुषोत्तम मास में दीप-दान करना चाहिये ॥ ३१ ॥

मैंने इस समय यह तीव्र दरिद्रता को नाश करने वाला दीप-दान तुमसे कहा, तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारी सेवा से मैं प्रसन्न हूँ ॥ ३२ ॥

अगस्त्य मुनि बोले – इस प्रकार वह श्रेष्ठ ब्राह्मण मन से दो भुजावाले मुरली को धारण करने वाले श्रीहरि भगवान्‌ का स्मरण करते हुए प्रयाग को गये ॥ ३३ ॥

किं पुनर्विधिना वत्स दीपं कुर्यात्‌ प्रयत्नरतः ॥ तस्माद्दीपः प्रकर्तव्या मासे श्रीपुरुषोत्तमे ॥ ३१ ॥

एतदुक्तं् मया तेऽद्य तीव्र दारिद्रयनाशनम्‌ ॥ स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि सन्तुष्टः सेवया तव ॥ ३२ ॥

अगस्त्य उवाच ॥ इत्युक्त्वा विप्रवर्योऽसौ प्रयागं सञ्जगाम ह ॥ द्विभुजं मुरलीहस्तं मनसा श्रीहरिं स्मरन्‌ ॥ ३३ ॥

अनुगत्वोग्रदेवं तं कियन्मासं निजाश्रमात्‌ ॥ पुनरावव्रतुर्नत्वा दम्पती हृष्टमानसौ ॥ ३४ ॥

आसाद्य स्वाश्रमं भक्त्या पुरुषोत्तममानसौ ॥ निन्यतुर्मासयुगलं द्विजभक्तिपरायणौ ॥ ३५ ॥

गते मासद्वये श्रीमानागतः पुरुषोत्तमः ॥ तौ तस्मिंश्चक्रतुर्दीपं गुरुभक्तिपरायणौ ॥ ३६ ॥

वे दोनों अपने आश्रम से उग्रदेव के पीछे जाकर उनके पास कुछ मासपर्यन्त वास करके, प्रसन्न मन हो, दोनों स्त्री-पुरुष उग्रदेव को नमस्कार कर, फिर अपने आश्रम को चले आये ॥ ३४ ॥

अपने आश्रम में आकर भक्ति से पुरुषोत्तम में मन लगाकर, ब्राह्मण की भक्ति में तत्पर उन दोनों स्त्री-पुरुष ने दो मास बिताया ॥ ३५ ॥

दो मास बीत जाने पर श्रीमान्‌ पुरुषोत्तम मास आया, उस पुरुषोत्तम मास में वे दोनों गुरुभक्ति में तत्पर हो दीप-दान को करते हुए ॥ ३६ ॥

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