अध्याय २४

आलस्य को छोड़कर वे दोनों ऐश्व॥र्य के लिए इंगुदी के तेल से दीप-दान करते रहे। इस प्रकार दीप-दान करते उन दोनों को श्रीपुरुषोत्तम मास बीत गया ॥ ३७ ॥

उग्रदेव ब्राह्मण के प्रसाद से शुद्धान्तःकरण होकर समय पर काल के वशीभूत हो इन्द्र की पुरी को गये ॥ ३८ ॥

वहाँ होनेवाले सुखों को भोग कर पृथिवी पर भारतखण्ड में उग्रदेव के प्रसाद से श्रेष्ठ जन्म को उन दोनों स्त्री-पुरुष ने धारण किया ॥ ३९ ॥

इङ्‌गुदीजेन तैलेन वैभवार्थमतन्द्रितौ ॥ एवं तयोः कृतवतोर्जगाम पुरुषोत्तमः ॥ ३७ ॥

उग्रदेवप्रसादेन विनिर्धूतमनोमलौ ॥ कालस्य वशमापन्नौ पुरन्दरपुरीं गतौ ॥ ३८ ॥

तत्रत्यं भोगमासाद्य पृथिव्यां भारताजिरे ॥ उग्रदेवप्रसादेन वरं जनुरवापतुः ॥ ३९ ॥

वीरबाहुसुतस्त्वं च चित्रबाहुरिति श्रुतः ॥ पूर्वस्मिन्यो मणिग्रीवो मृगहिंसापरायणः ॥ ४० ॥

इयं चन्द्रकला नाम्नी महिषी याऽधुना तव ॥ सुन्दरीति समाख्याता पुनर्जनुषि तेऽङ्गना ॥ ४१ ॥

पातिव्रत्येन धर्मेण तवाद्याङ्गार्धहारिणी ॥ पतिव्रता हि या नारी पतिपुण्यार्धभागिनी ॥ ४२ ॥

पूर्व जन्म में जो तुम मृग की हिंसा में तत्पर मणिग्रीव थे वह वीरबाहु के पुत्र चित्रबाहु नाम से प्रसिद्ध राजा हुए ॥ ४० ॥

इस समय यह चन्द्रकला नामक जो तुम्हारी स्त्री है वह पूर्व जन्म में सुन्दरी नाम से तुम्हारी स्त्री थी ॥ ४१ ॥

पतिव्रत धर्म से यह तुम्हारे अर्धांग की भागिनी है। जो स्त्री पतिव्रता होती हैं वे अपने पति के पुण्य का आधा भाग लेनेवाली होती हैं ॥ ४२ ॥

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