अध्याय २४

श्रीपुरुषोत्तम मास में इंगुदी के तेल से दीप-दान करने से तुमको यह निष्कण्टक राज्य मिला ॥ ४३ ॥

जो पुरुष श्रीपुरुषोत्तम मास में घृत से अथवा तिल के तेल से अखण्ड दीप-दान करता है तो फिर कहना ही क्या है ॥ ४४ ॥

पुरुषोत्तम मास में दीप-दान का यह फल कहा है इसमें कुछ सन्देह नहीं है। जो उपवास आदि नियमों से श्रीपुरुषोत्तम मास का सेवन करता है तो उसका कहना ही क्या है ॥ ४५ ॥

कृतेन दीपदानेन मासे श्रीपुरुषोत्तमे ॥ इङ्‌गुदीजेन तैलेन तव राज्यमकण्टकम्‌ ॥ ४३ ॥

किं पुनः सर्पिषा दीपं तिलतैलेन वा पुनः ॥ यः करोति ह्यखण्डं वै मासे श्रीपुरुषोत्तमे ॥ ४४ ॥

पुरुषोत्तमदीपस्य फलमेतन्न संशयः ॥ किं पुनश्चोपवासाद्यैश्चरतः पुरुषोत्तमम्‌ ॥ ४५ ॥

बाल्मीकिरुवाच ॥ चित्रबाहुचरितं पुरातनं सन्निरूप्य कलशोद्भवो मुनिः ॥ सत्कृति  समधिगम्य तत्कृतामक्षयाशिषमुदीर्य निर्ययौ ॥ ४६ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे दृढधन्वोपाख्याने दीपमाहात्म्यकथनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥

बाल्मीकि मुनि बोले – इस प्रकार अगस्त्य मुनि राजा चित्रबाहु के पूर्व जन्म का वृत्तान्त कहकर और राजा चित्रबाहु से किए गये सत्कार को लेकर तथा अक्षय आशीर्वाद देकर चले गये ॥ ४६ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे दृढ़धन्वोपाख्याने दीपमाहात्म्य कथनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥

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