अध्याय २५

स्त्री के साथ ब्राह्मणों को प्रसन्न कर हाथ में मोदक देवे और ब्राह्मणियों को विधिपूर्वक वस्त्र आभूषण से अलंकृत कर वंशी देवे ॥ ५६ ॥

सीमा तक उन ब्राह्मणों को पहुँचाकर विसर्जन करे। मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन ॥ यत्पूजितं मया देव परिपूर्ण तदस्तु मे ॥ १ ॥ इस मन्त्र से पुरुषोत्तम भगवान्‌ को क्षमापन समर्पण करके ॥ ५७ ॥

यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु ॥ न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो बन्दे तमच्युतम्‌ ॥ १ ॥ इस मन्त्र से जनार्दन भगवान्‌ को नमस्कार कर जो कुछ कमी रह गई हो वह अच्युत भगवान्‌ की कृपा से पूर्ण फल देनेवाला हो यह कहकर यथासुख विचरे ॥ ५८ ॥

परितोष्य सपत्नीरकान्‌ हस्ते दद्याच्च मोदकान्‌ ॥ पत्नीणभ्यो वैष्णवीर्दद्यादलङ्‌कृत्य विधानतः ॥ ५६ ॥

आसीमान्तमनुव्रज्य ब्राह्मणांस्तान्‌ विसर्जयेत्‌ ॥ मन्त्रहीनेति मन्त्रेण क्षमाप्य पुरुषोत्तमम्‌ ॥ ५७ ॥

यस्य स्मृत्येति मन्त्रेण नमस्कृत्य जनार्दनम्‌ ॥ यदूनं तत्तु सम्पूर्णं विधाय विचरेत्‌ सुखम्‌ ॥ ५८ ॥

अन्नंस विभज्य भूतेभ्यो यथाभागमकुत्सयन्‌ ॥ भुञ्जीत स्वजनैः सार्धं मिथ्यावादविवर्जितः ॥ ५९ ॥

दर्शस्य दिवसे प्राप्तेभ कुर्याज्जागरणं निशि ॥ राधिकासहितं हैमं पूजयत्‌ पुरुषोत्तमम्‌ ॥ ६० ॥

पूजान्ते च नमस्कृत्य सपत्नी्को मुदान्वितः ॥ व्रती विसर्जयेद्देवं सराधं पुरुषोत्तमम्‌ ॥ ६१ ॥

अन्न का यथाभाग विभाग कर भूतों को देकर मिथ्याभाषण से रहित हो, अन्न की निन्दा न करता हुआ कुटुम्बिजनों के साथ भोजन करे ॥ ५९ ॥

अमावस्या के दिन रात्रि में जागरण करे। सुवर्ण की प्रतिमा में राधिका के सहित पुरुषोत्तम भगवान्‌ का पूजन करे ॥ ६० ॥

पूजा के अन्त में सपत्नीमक व्रती प्रसन्नचित्त हो नमस्कार कर राधिका के साथ पुरुषोत्तम देव का विसर्जन करे ॥ ६१ ॥

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