अध्याय २५

फिर आचार्यं को मूर्ति के सहित चढ़ा हुआ सामान को देवे। अपनी इच्छानुसार यथायोग्य अन्नुदान को देवे ॥ ६२ ॥

जिस किसी उपाय से इस व्रत को करे और उत्तम भक्ति से द्रव्य के अनुसार दान देवे ॥ ६३ ॥

स्त्री अथवा पुरुष इस व्रत को करने से जन्म-जन्म में दुःख, दारिद्रय और दौर्भाग्य को नहीं प्राप्त होते हैं ॥ ६४ ॥

आचार्याय ततो दद्यादुपहारं समूर्तिकम्‌ ॥ अन्नदानं यथायोग्यं दद्यादिच्छानुसारतः ॥ ६२ ॥

येन केनाप्युपायेन व्रतमेतत्‌ समाचरेत्‌ ॥ कुर्याच्च् परया भक्त्या दानं वित्तानुसारतः ॥ ६३ ॥

नारी वाथ नरो वापि व्रतमेतत्‌ समाचरेत्‌ ॥ दुःखदारिद्रयदौर्भाग्यं नाप्नुयाज्जयन्मजन्मनि ॥ ६४ ॥

ये कुर्वन्ति जना लोके नानापूर्णमनोरथाः ॥ विमानान्यधिरुह्यैव यान्ति वैकुण्ठमुत्तमम्‌ ॥ ६५ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इत्थं यो विधिमवलम्ब्य चर्करीति श्रीकृष्णप्रियतममासमादरेण ॥ गोलोकं व्रजति विधूय पापराशिं चात्रत्यं सुखमनुभूय पूर्वपुम्भिः ॥ ६६ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे नारायणनारदसंवादे दृढधन्वोपाख्याने व्रतोद्यापनविधिकथनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥

जो लोग इस व्रत को करते हैं वे इस लोक में अनेक प्रकार के मनोरथों को प्रात्प करके सुन्दर विमान पर चढ़कर श्रेष्ठ वैकुण्ठ लोक को जाते हैं ॥ ६५ ॥

श्रीनारायण बोले – इस प्रकार जो पुरुष श्रीकृष्ण भगवान्‌ का प्रिय पुरुषोत्तम मासव्रत विधिपूर्वक आदर के साथ करता है वह इस लोक के सुखों को भोगकर और पापराशि से मुक्त होकर अपने पूर्व पुरुषों के साथ गोलोक को जाता है ॥ ६६ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये दृढधन्वोपाख्याने व्रतोद्यापनविधिकथनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥

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