अध्याय २५

अथवा उसका आधा अथवा उसका आधा यथाशक्ति पंचधान्य से उत्तम सर्वतोभद्र बनावे ॥ ७ ॥

बाद सर्वतोभद्र मण्डल के ऊपर सुवर्ण, चाँदी, ताँबा अथवा मिट्टी के छिद्र रहित शुद्ध चार कलश स्थापन करना चाहिये ॥ ८ ॥

चार व्यूह के प्रीत्यर्थ चारों दिशाओं में बेल से युक्त, उत्तम वस्त्र से वेष्टित, पान से युक्त उन कलशों को करना ॥ ९ ॥

तदर्धेन तदर्धेन निजशक्त्यनुसारतः ॥ पञ्चधान्येन कुर्वीत सर्वतोभद्रमुत्तमम्‌ ॥ ७ ॥

चत्वारः कलशाः स्थाप्या हैमा वा राजताः शुभाः ॥ ताम्रा वा मृन्मयाः शुद्धा अव्रणा मण्डलोपरि ॥ ८ ॥

चतुर्दिक्षु चतुर्व्यूहप्रीतये श्रीफलान्विताः ॥ सद्वस्त्रवेष्टिता नागवल्लीवदलसमन्विताः ॥ ९ ॥

वासुदेवं हलधरं प्रद्युम्नं देवमुत्तमम्‌ ॥ अनिरुद्धं चतुर्ष्वेवं स्थापयेत्कलशेषु च ॥ १० ॥

पुरुषोत्तमव्रतारम्भे स्थापितं पुरुषोत्तमम्‌ ॥ सराधं देवदेवेशं कलशेन स्रमन्वितम्‌ ॥ ११ ॥

तत आनीय तन्मध्ये मण्डलोपरि विन्यसेत्‌ ॥ आचार्यं वैष्णवं कृत्वा वेदवेदाङ्गपारगम्‌ ॥ १२ ॥

उन चारों कलशों पर क्रम से वासुदेव, हलधर, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध देव को स्थापित करे ॥ १० ॥

पुरुषोत्तम मास व्रत के आरम्भ में स्थापित किये हुए राधिका सहित देवदेवेश पुरुषोत्तम भगवान्‌ को कलशयुक्त ॥ ११ ॥

वहाँ से लाकर मण्डल के ऊपर मध्यभाग में स्थापित करे। वेद-वेदांग के जानने वाले वैष्णव को आचार्य बनाकर ॥ १२ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11