अध्याय २५

जप के लिए चार ब्राह्मणों का वरण करे। उनको अँगूठी के सहित दो-दो वस्त्र देना चाहिये ॥ १३ ॥

प्रसन्न मन से वस्त्र-आभूषण आदि से आचार्य को विभूषित करके फिर शरीरशुद्धि के लिय प्रायश्चित्त गोदान करे ॥ १४ ॥

तदनन्तर स्त्री के साथ पूर्वोक्त विधि से पूजा करनी चाहिए। और वरण किए हुए चार ब्राह्मणों से चार व्यूह का जप कराना चाहिए ॥ १५ ॥

विप्राश्चित्वार एवात्र वरणीया जपार्थिना ॥ द्वे द्वे वस्त्रे च दातव्ये हस्तमुद्रादिसंयुते ॥ १३ ॥

आचार्यं समलंकृत्य वस्त्रभूषादिभिर्मुदा ॥ ततो देहविशुद्धयर्थं प्रायश्चित्तं समाचरेत्‌ ॥ १४ ॥

ततः पूर्वोक्तविधिना पूजा कार्या सह स्त्रिया ॥ चतुर्व्यूहजपः कार्यो वृतैविप्रैश्चतुर्विधैः ॥ १५ ॥

चतुर्दिक्षु प्रकर्तव्या दीपाश्चात्वार उद्धृताः ॥ अर्ध्यदानं ततः कार्यं नारिकेलादिभिः क्रमात्‌ ॥ १६ ॥

पञ्चरत्नसमायुक्तैर्जानुभ्यां सक्तभूतलः ॥ स्वपाणिपुटमध्यस्थैर्यथालब्धैः फलैः शुभैः ॥ १७ ॥

श्रद्धाभक्तिसमायुक्तः सपत्नीाको मुदान्वितः ॥ अर्ध्यं दद्यात्‌ प्रहृष्टैभन मनसा श्रीहरि स्मरन्‌ ॥ १८ ॥

अथ अर्ध्यमन्त्रः ॥ देवदेव नमस्तुभ्यं पुराणपुरुषोत्तम ॥ गृहाणार्ध्यं मया दत्तं राधया सहिता हरे ॥ १९ ॥

और चार दिशाओं में चार दीपक ऊपर के भाग में स्थापित करना चाहिये। फिर नारियल आदि फलों से क्रम के अनुसार अर्ध्यदान करना चाहिए ॥ १६ ॥

घुटनों के बल से पृथिवी में स्थित होकर पञ्च रत्नत और यथालब्ध अच्छे फलों को दोनों हाथ में लेकर ॥ १७ ॥

श्रद्धा भक्ति से युक्त स्त्री के साथ हर्ष से युक्त हो प्रसन्न मन से श्रीहरि भगवान्‌ का स्मरण करता हुआ अर्ध्यदान करे ॥ १८ ॥

अर्ध्यदान का मन्त्र – हे देवदेव! हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। हे हरे! राधिका के साथ आप मुझसे दिये गये अर्ध्य को ग्रहण करें ॥ १९ ॥

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