अध्याय २५

नवीन मेघ के समान श्यामवर्ण, दो भुजाधारी, मुरली हाथ में धारण किये, पीताम्बरधारी, देव, राधिका के सहित पुरुषोत्तम भगवान्‌ को नमस्कार है ॥ २० ॥

इस प्रकार भक्ति के साथ राधिका के सहित पुरुषोत्तम भगवान्‌ को नमस्कार करके चतुर्थ्यन्त नाममन्त्रों से तिल की आहुति देवे ॥ २१ ॥

इसके बाद उनके मन्त्रों से तर्पण और मार्जन करे। बाद राधिका के सहित पुरुषोत्तम देव की आरती करे ॥ २२ ॥

वन्दे नवघनश्यामं द्विभुजं मुरलीधरम्‌ ॥ पीताम्बरधरं देवं सराधं पुरुषोत्तमम्‌ ॥ २० ॥

एवं भक्त्या हरिं नत्वा सराधं पुरुषोत्तमम्‌ ॥ चतुर्थ्यन्तैर्नाममन्त्रैस्तिलहोमं च कारयेत्‌ ॥ २१ ॥

ततस्तदन्ते तन्मन्त्रैः कार्ये तर्पणमार्जने ॥ नीराजयेत्ततो देवं सराधं पुरुषोत्तमम्‌ ॥ २२ ॥

अथ नीराजनमन्त्रः ॥ नीराजयामि देवेशमिन्दीवरदलच्छविम्‌ ॥ राधिकारमणं प्रेम्णा कोटिकन्दर्पसुन्दरम्‌ ॥ २३ ॥

अथ ध्यानम्‌ ॥ अन्तर्ज्योतिरनन्तरत्नरचिते सिंहासने संस्थितं वंशीनादविमोहितव्रजवधूवृन्दावने सुन्दरम्‌ ॥ ध्यायेद्राधिकया सकौस्तुभमणिप्रद्योतितोरस्थलं राजद्रत्निकिरीटकुण्डलधरं प्रत्यग्रपीताम्बरम्‌ ॥ २४ ॥

अब नीराजन का मन्त्र-कमल के दल के समान कान्ति वाले, राधिका के रमण, कोटि कामदेव के सौन्दर्य को धारण करनेवाले देवेश का प्रेम से नीराजन करता हूँ ॥ २३ ॥

अथ ध्यान मन्त्र-अनन्त रत्नों  से शोभायमान सिंहासन पर स्थित, अन्तर्ज्योति, स्वरूप, वंशी शब्द से अत्यन्त मोहित व्रज की स्त्रियों से घिरे हुए हैं इसलिये वृन्दावन में अत्यन्त शोभायमान, राधिका और कौस्तुभमणि से चमकते हुए हृदय वाले शोभायमान रत्नों  से जटित किरीट और कुण्डल को धारण करनेवाले, आप नवीन पीताम्बर को धारण किए हैं इस प्रकार पुरुषोत्तम भगवान्‌ का ध्यान करें ॥ २४ ॥

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