अध्याय २५

फिर राधिका के सहित पुरुषोत्तम भगवान्‌ को पुष्पाञ्जंलि देकर स्त्री के साथ साष्टांग नमस्कार करे ॥ २५ ॥

नवीन मेघ के समान श्यामवर्ण पीतवस्त्रधारी, अच्युत, श्रीवत्स चिन्ह से शोभित उरस्थल वाले राधिका सहित हरि भगवान्‌ को नमस्कार है ॥ २६ ॥

ब्राह्मण को सुवर्ण के साथ पूर्णपात्र देवे। बाद प्रसन्नता के साथ आचार्य को बहुत-सी दक्षिणा देवे ॥ २७ ॥

ततःपुष्पाञ्जलिं दत्त्वा राधिका सहिते हरौ ॥ नमस्कारं प्रकुर्वीत साष्टाङ्गंगृहिणीयुतः ॥ २५ ॥

नौमि नित्यं घनश्यामं पीतवाससमच्युतम्‌ ॥ श्रीवत्सभासितोरस्कं राधिकासहितं हरिम्‌ ॥ २६ ॥

पूर्णपात्रं ततो दद्याद्‌ ब्रह्मणे सहिरण्यकम्‌ ॥ आचार्याय ततो दद्याद्दक्षिणां विपुलां मुदा ॥ २७ ॥

आचार्यं तोषयेद्भक्त्या वस्त्रैराभरणैरपि ॥ सपत्नीरकं ततो दद्यादृत्विग्भ्यो दक्षिणां पराम्‌ ॥ २८ ॥

घेनुरेका प्रदातव्या सुशीला च पयस्विनी ॥ सचैला च सवत्सा च घण्टाभरणभूषिता ॥ २९ ॥

ताम्रपृष्ठी हेमश्रृङ्गी सरौप्यखुरभूषिता ॥ घृतपात्रं ततो दद्यात्तिलपात्रं तथैव च ॥ ३० ॥

सपत्नीृक आचार्य को भक्ति से वस्त्र आभूषण से प्रसन्न करे, फिर ऋत्विजों को उत्तम दक्षिणा देवे ॥ २८ ॥

बछड़ा सहित, वस्त्र सहित, दूध देनेवाली, सुशीला गौ को घण्टा आभूषण से भूषित करके उसका दान करना चाहिये ॥ २९ ॥

ताँबे का पीठ, सुवर्ण का श्रृंग, चाँदी के खुर से भूषित कर देवे, बाद घृतपात्र देवे और उसी प्रकार तिलपात्र देवे ॥ ३० ॥

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