अध्याय २५

स्त्री-पुरुष को पहिनने के लिए उमा-महेश्व र के प्रीत्यर्थ वस्त्र का दान करे। आठ प्रकार का पद देवे और एक जोड़ा जूता देवे ॥ ३१ ॥

यदि शक्ति हो तो आयु की चंचलता को विचारता हुआ वैष्णव ब्राह्मण को श्रीमद्भागवत का दान करे, देरी नहीं करे ॥ ३२ ॥

श्रीमद्भागवत साक्षात्‌ भगवान्‌ का अद्भुत रूप है। जो वैष्णव पण्डित ब्राह्मण को देवे ॥ ३३ ॥

उमामहेश्वरं दद्याद्दम्पत्योः परिधायकम्‌ ॥ पदमष्टविधं दद्यादुपानद्युगलं तथा ॥ ३१ ॥

श्रीमद्भागवतं दद्याद्वैष्णवाय द्विजन्मने ॥ शक्तिश्चे॥न्न विलम्बेत चलमायुर्विचारयन्‌ ॥ ३२ ॥

श्रीमद्भागवतं साक्षाद्भगवद्रूपमद्भुतम्‌ ॥ यो दद्याद्वैष्णवायैव पण्डिताय द्विजन्मने ॥ ३३ ॥

स कोटिकुलमुद्धृत्य ह्यप्सरोगणसेवितः ॥ विमानमधिरुह्यैति गोलोकं योगिदुर्लभम्‌ ॥ ३४ ॥

कन्यादानसहस्राणि वाजपेयशतानि च ॥ सधान्यक्षेत्रदानानि तुलादानानि यानि च ॥ ३५ ॥

महादानानि यान्यष्टौ छन्दोदानानि यानि च ॥ श्रीभागवतदानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्‌ ॥ ३६ ॥

तो वह कोटि कुल का उद्धार कर अप्सरागणों से सेवित विमान पर सवार हो योगियों को दुर्लभ गोलोक को जाता है ॥ ३४ ॥

हजारों कन्यादान सैकड़ों वाजपेय यज्ञ, धान्य के साथ क्षेत्रों के दान और जो तुलादान आदि ॥ ३५ ॥

आठ महादान हैं और वेददान हैं वे सब श्रीमद्भागवत दान की सोलगवीं कला की बराबरी नहीं कर सकते हैं ॥ ३६ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11