अध्याय २५

इसलिये श्रीमद्भागवत को सुवर्ण के सिंहासन पर स्थापित कर वस्त्र-आभूषण से अलंकृत कर विधिपूर्वक वैष्णव ब्राह्मण को देवे ॥ ३७ ॥

काँसे के ३० (तीस) सम्पुट में तीस-तीस मालपूआ रखकर ब्राह्मणों को देवे ॥ ३८ ॥

हे पृथिवीपते! हर एक मालपूआ में जितने छिद्र होते हैं उतने वर्ष पर्यन्त वैकुण्ठ लोक में जाकर वास करता है ॥ ३९ ॥

तस्माद्यत्ने३न तद्‌देयं वैष्णवाय द्विजन्मने ॥ सम्भूष्य वस्त्रभूषाभिर्हेमसिंहासनस्थितम्‌ ॥ ३७ ॥

कांस्यानि सम्पुटान्येव त्रिंशद्‌देयानि सर्वथा ॥ त्रिंशत्त्रिंशदपूपैश्च मध्ये सम्पूरितानि च ॥ ३८ ॥

प्रत्यपूपं तु यावन्ति छिद्राणि पृथिवीपते ॥ तावद्वर्षसहस्राणि वैकुण्ठे वसते नरः ॥ ३९ ॥

ततः प्रयाति गोलोकं निर्गुणं योगिदुर्लभम्‌ ॥ यद्गत्वा न निवर्तन्ते ज्योतिर्धाम सनातनम्‌ ॥ ४० ॥

सार्धप्रस्थद्वयं कांस्यसम्पुटं परिकीतितम्‌ ॥ निर्धनेन यथाशक्त्यैतत्कार्यं व्रतपूर्त्तये ॥ ४१ ॥

अथवाऽपूपसामग्रीमपक्कां सफलां पराम्‌ ॥ तत्राधाय प्रदेयं तत्‌ पुरुषोत्तमप्रीतये ॥ ४२ ॥

बाद योगियों को दुर्लभ, निर्गुण गोलोक को जाता है। जिस सनातन ज्योतिर्धाम गोलोक को जाकर नहीं लौटते हैं ॥ ४० ॥

अढ़ाई सेर काँसे का सम्पुट कहा गया। निर्धन पुरुष यथाशक्ति व्रतपूर्ति के लिये सम्पुट दान करे ॥ ४१ ॥

अथवा पुरुषोत्तम भगवान्‌ के प्रीत्यर्थ मालपूआ का कच्चा सामान, फल के साथ सम्पुट में रखकर देवे ॥ ४२ ॥

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