अध्याय २५

हे नराधिप! निमन्त्रित सपत्नीेक ब्राह्मणों को पुरुषोत्तम भगवान्‌ के समीप संकल्प करके देवे ॥ ४३ ॥

अब प्रार्थना लिखते हैं – हे श्रीकृष्ण! हे जगदाधार! हे जगदानन्ददायक! अर्थात्‌ हे जगत्‌ को आनन्द देने वाले! मेरी समस्त इस लोक तथा परलोक की कामनाओं को शीघ्र पूर्ण करें ॥ ४४ ॥

इस प्रकार गोविन्द भगवान्‌ की प्रार्थना कर प्रसन्नता पूर्वक पुरुषोत्तम भगवान्‌ का स्मरण करता हुआ स्त्रीसहित सदाचारी ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥ ४५ ॥

निमन्त्रितानां विप्राणां सस्त्रीकाणां नराधिप ॥ सङ्कल्पं च प्रकुर्वीत पुरुषोत्तमसन्निधौ ॥ ४३ ॥

अथ प्रार्थना ॥ श्रीकृष्ण जगदाधार जगदानन्ददायक ॥ ऐहिकामु्ष्मिकान्कामान्‌ निखिलान्पूरयाशु मे ॥ ४४ ॥

इति सम्प्रार्थ्य गोविन्दं भोजयेद्‌ब्राह्मणान्मुदा ॥ सपत्नीाकान्‌ सदाचारान्‌ संस्मरन्पुरुषोत्तमम्‌ ॥ ४५ ॥

संपूज्य विधिवद्भक्त्या भोजयेत्‌ घृतपायसैः ॥ विप्ररूपं हरिं स्मृत्वा स्त्रीरूपां राधिकां स्मरन्‌ ॥ ४६ ॥

भोजनस्य तु सङ्कल्पमाचरेद्विधिना व्रती ॥ द्राक्षाभिः कदलीभिश्च चूतैश्च विविधैरपि ॥ ४७ ॥

घृतपाचितपक्कान्नैःम शुभैश्च माषकैर्वटैः ॥ शर्कराघृतपूपैश्च फाणितैः खण्डमण्डकैः ॥ ४८ ॥

ब्राह्मणरूप हरि और ब्राह्मणीरूप राधिका का स्मरण करता हुआ भक्ति पूर्वक गन्धाक्षत से पूजन कर घृत पायस का भोजन करावे ॥ ४६ ॥

व्रत करने वाला विधिपूर्वक भोजन सामान का संकल्प करे। अंगूर, केला, अनेक प्रकार के आम के फल ॥ ४७ ॥

घी के पके हुए, सुन्दर उड़द के बने बड़े, चीनी घी के बने घेवर, फेनी, खाँड़ के बने मण्डक ॥ ४८ ॥

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