अध्याय २५

खरबूजा, ककड़ी का शाक, अदरख, सुन्दर नीबू, आम और अनेक प्रकार के अलग-अलग शाक ॥ ४९ ॥

इस प्रकार षट्‌रसों से युक्त चार प्रकार का भोजन सुगन्धित पदार्थ से वासित गोरस को परोस कर, कोमल वाणी बोलता हुआ ॥ ५० ॥

यह स्वादिष्ट है, इसको आपके लिए तैयार किया है, प्रसन्नता के साथ भोजन कीजिये। हे ब्रह्मन्‌! हे प्रभो! जो इस पकाये हुए पदार्थों में अच्छा मालूम हो उसको माँगिये ॥ ५१ ॥

ऊर्वारुकर्कटीशाकैरार्द्रकैश्च सुनिम्बुकैः ॥ अन्यैश्च विविधैः शाकैराम्रैः पक्वैः पृथक्‌ पृथक्‌ ॥ ४९ ॥

चतुर्धा भोजनैरेव षड्‌रसैः सह सङ्गतैः ॥ वासितान्‌ गोरसांस्तत्र परिवेष्य मृदु ब्रुवन्‌ ॥ ५० ॥

इदं स्वादु मुदा भोज्यं भवदर्थे प्रकल्पितम्‌ ॥ याच्यतां रोचते ब्रह्मन्‌ यन्मया पाचितं प्रभो ॥ ५१ ॥

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मिजातं मे जन्मसार्थकम्‌ ॥ भोजयित्वा मुदा विप्रान्‌ देयास्ताम्बूलदक्षिणाः ॥ ५२ ॥

एला-लवङ्ग-कर्पूर-नागवल्ली‌दलानि च ॥ कस्तूरी मुरामांसी च चूर्णं च खदिरं शुभम्‌ ॥ ५३ ॥

एतैश्चमीलितैर्देयं ताम्बूलं भगवत्प्रियम्‌ ॥ तस्मादेवं विधायैव देयं ताम्बूलमादरात्‌ ॥ ५४ ॥

ताम्बूलं यो द्विजाग्र्‌याय एवं कृत्वा प्रयच्छति ॥ सुभगश्च भवेदत्र परत्रामृतभुग्भवेत्‌ ॥ ५५ ॥

मैं धन्य हूँ, आज मैं ब्राह्मणों के अनुग्रह का पात्र हुआ, मेरा जन्म सफल हुआ, इस प्रकार कह कर आनन्द पूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराकर ताम्बूल और दक्षिणा देवे ॥ ५२ ॥

इलायची, लौंग, कपूर, नागरपान, कस्तूरी, जावित्री, कत्था और चूना ॥ ५३ ॥

इन सब पदार्थों को मिलाकर भगवान्‌ के लिये प्रिय ताम्बूल को देना चाहिये। इसलिये इन सामानों से युक्त करके ही आदर के साथ ताम्बूल देना चाहिए ॥ ५४ ॥

जो इस प्रकार ताम्बूल को ब्राह्मण श्रेष्ठ के लिये देता है वह इस लोक में ऐश्वार्य सुख भोग कर परलोक में अमृत का भोक्ता होता है ॥ ५५ ॥

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