अध्याय २६

अब उद्यापन के पीछे व्रत के नियम का त्याग कहते हैं। बाल्मीकि मुनि बोले – सम्पूर्ण पापों के नाश के लिये गरुडध्वज भगवान्‌ की प्रसन्नता के लिये धारण किये व्रत नियम का विधि पूर्वक त्याग कहते हैं ॥ १ ॥

हे राजन्‌! नक्तव्रत करनेवाला मनुष्य समाप्ति में ब्राह्मणों को भोजन करावे और बिना माँगे जो कुछ मिल जाय उसको खा कर रहने में सुवर्णदान करना ॥ २ ॥

अमावास्या में भोजन का नियम पालन करने वाला दक्षिणा के साथ गोदान देवे। और जो आँवला जल से स्नान करता है वह दही अथवा दूध का दान देवे ॥ ३ ॥

अथोद्यापनानन्तरं व्रतनियममोक्षणमुच्यते ॥ बाल्मीकिरुवाच ॥ अशेषपापनाशार्थं गरुडध्वजतुष्टये ॥ गृहीतनियमत्यागश्चोच्यते विधिपूर्वकः ॥ १ ॥

नक्तभोजी नरो राजन्‌ ब्राह्मणान्‌ भोजयेदथ ॥ अयाचिते व्रते चैव स्वर्णदानं समाचरेत्‌ ॥ २ ॥

अमावास्याशनो यस्तु प्रदद्याद्‌ गां सदक्षिणाम्‌ ॥ धात्रीस्नानं नरो यस्तु दधि वा क्षीरमेव च ॥ ३ ॥

फलानां नियमे राजन्‌ फलदानं समाचरेत्‌ ॥ तैलस्थाने घृतं देयं घृतस्थाने पयस्तथा ॥ ४ ॥

धान्यानां नियमे राजन्‌ गोधूमान्‌ शालितण्डुलान्‌ ॥ भूमौ च शयने राजन्‌ सतूलीं सपरिच्छदाम्‌ ॥ ५ ॥

सुखदां चात्मनो न्यस्य ह्यन्तर्यामी प्रियो जनः ॥ पत्रभोजी नरो यस्तु भोजनं घृतशर्कराम्‌ ॥ ६ ॥

हे राजन्‌! फलों का नियम किया है तो फलों का दान करे। तेल का नियम किया है अर्थात्‌ तैल छोड़ा है तो समाप्ति में घृतदान करे और घृत का नियम किया है तो दूध का दान करे ॥ ४ ॥

हे राजन्‌! धान्यों के नियम में गेहूँ और शालि चावल का दान करे। हे राजन्‌ यदि पृथ्वी में शयन का नियम किया है तो रूई भरे हुए गद्देृ और चाँदनी के सहित ॥ ५ ॥

अपने को सुख देने वाली तकिया आदि रख कर शय्या का दान करे, वह मनुष्य भगवान्‌ को प्रिय होता है। जो मनुष्य पत्र में भोजन करता है वह ब्राह्मणों को भोजन करावे, घृत चीनी का दान करे ॥ ६ ॥

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