अध्याय २६

मौनव्रत में सुवर्ण के सहित घण्टा और तिलों का दान करे। सपत्नीघक ब्राह्मण को घृतयुक्त पदार्थ से भोजन करावे ॥ ७ ॥

हे राजन्‌! नख तथा केशों को धारण करने वाला बुद्धिमान्‌ दर्पण का दान करे। जूता का त्याग किया है तो जूता का दान करे ॥ ८ ॥

लवण के त्याग में अनेक प्रकार के रसों का दान करे। दीपत्याग किया है तो पात्र सहित दीपक का दान करे ॥ ९ ॥

मौने घण्टां तिलांश्चैव सहिरण्यान्‌ प्रदापयेत्‌ ॥ दम्पत्योर्भोजनं चैव सस्नेहं च सुभोजनम्‌ ॥ ७ ॥

नखकेशधरो राजन्नादर्शं दापयेद्‌ बुधः ॥ उपानहौ प्रदातव्ये उपानहविवर्जनात्‌ ॥ ८ ॥

लवणस्य परित्यागे दातव्या विविधा रसाः ॥ दीपदाने नरो दद्यात्‌ पात्रयुक्तंज च दीपकम्‌ ॥ ९ ॥

अधिमासे नरो भक्त्या स वैकुण्ठे वसेत्‌ सदा ॥ दीपं च सघृतं ताम्रं काञ्चनीवर्तिसंयुतम्‌ ॥ १० ॥

पलमात्रं प्रदेयं स्याद्‌ व्रतसम्पूर्ण हेतवे ॥ एकान्तरोपवासे च कुम्भानष्टौ प्रदापयेत्‌ ॥ ११ ॥

सवस्त्रान्‌ काञ्चनोपेतान्‌ मृन्मयानथ काञ्चनान्‌ ॥ मासान्ते मोदकांस्त्रिंशच्छत्रोपानहसंयुतान्‌ ॥ १२ ॥

जो मनुष्य अधिकमास में भक्ति से नियमों का पालन करता है वह सर्वदा वैकुण्ठ में निवास करता है। ताँबे के पात्र में घृत और सुवर्ण की वत्ती रख कर दीपक का दान करे ॥ १० ॥

व्रत की पूर्ति के लिये पलमात्र का ही दान देवे। एकान्त में वास करने वाला आठ घटों का दान करे ॥ ११ ॥

वे घट सुवर्ण के हों या मिट्टी के उनको वस्त्र और सुवर्ण के टुकड़ों के सहित देवे। और मास के अन्त में छाता-जूता के साथ ३० (तीस) मोदक का दान करे ॥ १२ ॥

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