अध्याय २६

और भार ढोने में समर्थ बैल का दान करे। इन वस्तुओं के न मिलने पर अथवा यथोक्त करने में असमर्थ होने पर ॥ १३ ॥

हे राजन्‌! सम्पूर्ण व्रतों की सिद्धि को देने वाला ब्राह्मणों का वचन कहा गया है अर्थात्‌ ब्राह्मण से सुफल के मिलने पर व्रत पूर्ण हो जाता है। जो मलमास में एक अन्न का सेवन करता है ॥ १४ ॥

वह चतुर्भुज होकर परम गति को पाता है। इस लोक में एकान्न से बढ़कर दूसरा कुछ भी पवित्र नहीं है ॥ १५ ॥

अनड्‌वांश्च प्रदातव्यो धौरेयस्तु धुरि क्षमः ॥ सर्वेषामप्यलाभे च यथोक्तकरणं विना ॥ १३ ॥

द्विजवाक्यं स्मृतं राजन्‌ सम्पूर्णव्रतसिद्धिदम्‌ ॥ एकान्नेकन नरो यस्तु मलमासं निषेवते ॥ १४ ॥

चतुर्भुजो नरो भूत्वा स याति परमां गतिम्‌ ॥ एकान्नान्नापरं किञ्चित्पवित्रमिह विद्यते ॥ १५ ॥

एकान्नान्मुनयः सिद्धाःपरं निर्वाणमागताः ॥ अधिमासे नरो नक्तं यो भुङ्क्ते स नराधिपः ॥ १६ ॥

सर्वान्कामानवाप्नोति नरो नैवात्र संशयः ॥ पूर्वाह्णे भुञ्जते देवा मध्याह्ने मुनयस्तथा ॥ १७ ॥

अपराह्णे पितृगणाः स्वात्मार्थस्तु चतुर्थकः ॥ सर्व वेलामतिक्रम्य यस्तु भुङ्क्ते नराधिप ॥ १८ ॥

एक अन्न के सेवन से मुनि लोग सिद्ध होकर परम मोक्ष को प्राप्त हो गये। अधिकमास में जो मनुष्य रात्रि में भोजन करता है वह राजा होता है ॥ १६ ॥

वह मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त करता है इसमें जरा भी सन्देह नहीं है। देवता लोग दिन के पूर्वाह्ण में भोजन करते हैं और मुनि लोग मध्याह्न में भोजन करते हैं ॥ १७ ॥

अपराह्ण में पितृगण भोजन करते हैं। इसलिये अपने लिये भोजन का समय चतुर्थ प्रहर कहा गया है। हे नराधिप! जो सब बेला को अतिक्रमण कर चतुर्थ प्रहर में भोजन करता है ॥ १८ ॥

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