अध्याय २६

हे जनाधिप! उसके ब्रह्महत्यादि पाप नाश हो जाते हैं। हे महीपाल! रात्रि में भोजन करने वाला समस्त पुण्यों से अधिक पुण्य फल का भागी होता ॥ १९ ॥

और वह मनुष्य प्रतिदिन अश्व मेध यज्ञ के करने का फल प्राप्त करता है। भगवान्‌ के प्रिय पुरुषोत्तम मास में उड़द का त्याग करे ॥ २० ॥

वह उड़द छोड़ने वाला समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को जाता है। जो पातकी ब्राह्मण होकर यन्त्र में तिल पेरता है ॥ २१ ॥

ब्रह्महत्यादिपापानि नाशं यान्ति जनाधिप ॥ नक्तभोजी महीपाल सर्वपुण्याधिको भवेत्‌ ॥ १९ ॥

दिने दिनेऽश्वमेधस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ तस्मिन्विवर्जयेन्माषमधिमासे हरिप्रिये ॥ २० ॥

सर्वस्मान्मुच्यते पापाद्विष्णुलोकं स गच्छति ॥ तिलयन्त्राणि पापात्मा कुरुते ब्राह्मणोऽपि सन्‌ ॥ २१ ॥

तिलानां संख्यया राजन्‌ स वै तिष्ठति रौरवे ॥ चाण्डालयोनिमाप्नोति कुष्ठरोगेण पीडयते ॥ २२ ॥

शुक्ले कृष्णे नरो भक्त्या द्वादशीं समुपोषयेत्‌ ॥ आरुह्य गरुडं याति नरो भूत्वा चतुर्भुजः ॥ २३ ॥

स देवैः पूज्यमानोऽपि ह्यप्सरोगणसेवितः ॥ दशमीं द्वादशीं चैव एकभुक्तं च कारयेत्‌ ॥ २४ ॥

हे राजन्‌! वह ब्राह्मण तिल की संख्या के अनुसार उतने वर्ष पर्यन्त रौरव नरक में वास करता है फिर चाण्डाल योनि में जाता है और कुष्ठ रोग से पीड़ित होता है ॥ २२ ॥

जो मनुष्य शुक्ल और कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि में उपवास करता है वह मनुष्य चतुर्भुज हो गरुड़ पर बैठ कर वैकुण्ठ लोक को जाता है ॥ २३ ॥

और वह देवताओं से पूजित तथा अप्सराओं से सेवित होता है। एकादशी व्रत करनेवाला दशमी और द्वादशी के दिन एक बार भोजन करे ॥ २४ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7