अध्याय २६

जो मनुष्य देवदेव विष्णु भगवान्‌ के प्रीत्यर्थ व्रत करता है वह मनुष्य स्वर्ग को जाता है। हे राजन्‌! सर्वदा भक्ति से कुशा का मुट्ठा धारण करे, कुशमुष्टि का त्याग न करे ॥ २५ ॥

जो मनुष्य कुशा से मल, मूत्र, कफ, रुधिर को साफ करता है वह विष्ठा में कृमियोनि में जाकर वास करता है ॥ २६ ॥

कुशा अत्यन्त पवित्र कहे गये हैं, बिना कुशा की क्रिया व्यर्थ कही गई है क्योंकि कुशा के मूल भाग में ब्रह्मा और मध्य भाग में जनार्दन वास करते हैं ॥ २७ ॥

प्रीयते देवदेवस्य नरः स्वर्गमवाप्नुयात्‌ ॥ भक्त्या च सर्वदा राजन्‌ दर्भकूर्चं न वर्जयेत्‌ ॥ २५ ॥

दर्भेण मार्जयेद्यस्तु पुरीषं मूत्रमेव च ॥ श्लेनष्माणं रुधिरं वापि विष्ठायां जायते कृमिः ॥ २६ ॥

पवित्राः परमा दर्भा दर्भहीना वृथाः क्रियाः ॥ दर्भमूले वसेद्‌ ब्रह्मा मध्ये देवो जनार्दनः ॥ २७ ॥

दर्भाग्रे तु ह्युमानाथस्तस्माद्दर्भेण मार्जयेत्‌ ॥ न दर्भानुद्धरेच्छूद्रो न पिबेत्कपिलापयः ॥ २८ ॥

पत्रमध्ये न भुञ्जीत ब्रह्मपत्रस्य भूपते ॥ नोच्चरेत्‌ प्रणवं मन्त्रं पुरोडाशं न भक्षयेत्‌ ॥ २९ ॥

नासनं नोपवीतं च नाचरेद्वैदिकीं क्रियाम्‌ ॥ निर्विध्याचरणं कुर्वन्‌ पितृभिः सह मज्जतति ॥ ३० ॥

कुशा के अग्रभाग में महादेव वास करते हैं इसलिये कुशा से मार्जन करे। शूद्र जमीन से कुशा को न उखाड़े और कपिला गौ का दूध न पीवे ॥ २८ ॥

हे भूपते! पलाश के पत्र में भोजन न करे, प्रणवमन्त्र का उच्चा रण न करे, यज्ञ का बचा हुआ अन्न न भोजन करे ॥ २९ ॥

शूद्र कुशा के आसन पर न बैठे, जनेऊ को धारण न करे और वैदिक क्रिया को न करे। यदि विधि का त्याग कर मनमाना काम करता है तो वह शूद्र अपने पितरों के सहित नरक में डूब जाता है ॥ ३० ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7