अध्याय २६

चौदह इन्द्र तक नरक में पड़ा रहता है फिर मुरगा, सूकर, बानर योनि को जाता है ॥ ३१ ॥

इसलिये शूद्र हमेशा प्रणव का त्याग करे। हे भूमिप! शूद्र ब्राह्मणों के नमस्कार करने से नष्ट हो जाता है ॥ ३२ ॥

हे महाराज! इतना करने से व्रत परिपूर्ण कहा है। अथवा ब्राह्मणों को दक्षिणा न देने से मनुष्य नरक के भागी होते हैं ॥ ३३ ॥

पतन्ति नरके घोरे यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥ पश्चाच्च कौक्कुमटीं योनिं सूकरीं वानरीं च वा ॥ ३१ ॥

एतस्मात्कारणाच्शूद्रः प्रणवं वर्जयेत्सदा ॥ नमस्कारेण विप्राणां शूद्रो नश्यति भूमिप ॥ ३२ ॥

एतत्कृत्वा महाराज परिपूर्णं व्रतं चरेत्‌ ॥ अदत्त्वा दक्षिणां वापि नरकं यान्ति वै नराः ॥ ३३ ॥

व्रतवैकल्यमासाद्य ह्यन्धः कुष्ठी प्रजायते ॥ ३४ ॥

धरामराणां वचनैर्नरोत्तमा दिवौकसां वै पदमाप्नुवन्ति ॥ नोल्लअङ्घयेद्भूप वचांसि तेषां श्रेयोऽभिकामी मनुजः स विद्वान्‌ ॥ ३५ ॥

व्रत में विध्न होने से अन्धा और कोढ़ी होता है ॥ ३४ ॥

हे भूप! मनुष्यों में श्रेष्ठ मनुष्य पृथ्वी के देवता ब्राह्मणों के वचन से स्वर्ग को जाते हैं। हे भूप! इसलिये कल्याण को चाहने वाला विद्वान्‌ मनुष्य उन ब्राह्मणों के वचनों का उल्लंमघन न करे ॥ ३५ ॥

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