अध्याय २६

यह मैंने उत्तम, कल्याण को करनेवाला, पापों का नाशक, उत्तम फल को देनेवाला माधव भगवान्‌ को प्रसन्न करने वाला, मन को प्रसन्न करने वाला धर्म का रहस्य कहा इसका नित्य पाठ करे ॥ ३६ ॥

इदं मया धर्मरहस्यमुत्तमं श्रेयस्करं पापविमर्दनं च ॥ फलप्रदं माधवपुष्टिहेतोः पठेच्च नित्यं मनसोऽभिरामम्‌ ॥ ३६ ॥

यः श्रृणोति नरो राजन्‌ पठते वापि सर्वदा ॥ स याति परमं लोकं यत्र योगीश्वरो हरिः ॥ ३७ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे गृहीतनियमत्यागो नाम षड्‌विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥

हे राजन्‌! जो इसको हमेशा सुनता है अथवा पढ़ता है वह उत्तम लोक को जाता है जहाँ पर योगीश्वऽर हरि भगवान्‌ वास करते हैं ॥ ३७ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे गृहीतनियमत्यागो नाम षड्‌विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥

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