अध्याय २७

श्रीनारायण बोले – इस प्रकार कह कर मौन हुए मनीश्वार बाल्मीकि मुनि को सपत्नीतक राजा दृढ़धन्वा ने नमस्कार किया। बाद प्रसन्नता के साथ भक्तिपूर्वक पूजन किया ॥ १ ॥

उस राजा दृढ़धन्वा से की हुई पूजा को लेकर आशीर्वाद को दिया। तुम्हारा कल्याण हो। पापों का नाश करने वाली सरयू नदी को मैं जाऊँगा ॥ २ ॥

इस समय हम दोनों को इस प्रकार बात करते सायंकाल हो गया है। यह कह कर मुनिश्रेष्ठ बाल्मीकि मुनि शीघ्र चले गये ॥ ३ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इत्युक्त्वा विरतं राजा मुनीश्व रमनीनमत्‌ ॥ अपूजयत्ततो भक्त्या सपत्नीेको मुदान्वितः ॥ १ ॥

उररीकृत्य तत्पूजामाशीर्वादमुदीरयत्‌ ॥ स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि सरयूं पापनाशिनीम्‌ ॥ २ ॥

आवयोर्वदतोरेवं सायङ्कालाऽधुनाऽभवत्‌ ॥ इत्युक्त्वाऽऽशुजगामैव बाल्मीकिर्मुनिसत्तमः ॥ ३ ॥

आसीमान्तमनुव्रज्य राजाऽप्यागतवान्‌ गृहम्‌ ॥ आगत्य स्वप्रियामाह सुन्दरीं गुणसुन्दरीम्‌ ॥ ४ ॥

दृढधन्वोवाच ॥ अयि सुन्दरि संसारे ह्यसारे किं सुखं नृणाम्‌ ॥ रागद्वेषादिषट्‌शत्रौ गंधर्वनगरोपमे ॥ ५ ॥

कृमिविड्‌भस्मरूपेऽस्मिन्‌ देहे मे किं प्रयोजनम्‌ ॥ वातपित्त कफोद्रेकमलमूत्रासृगाकुले ॥ ६ ॥

राजा दृढ़धन्वा भी सीमा तक बाल्मीकि मुनि को पहुँचा कर अपने घर लौट आया। घर जाकर अपनी गुणसुन्दरी नामक सुन्दरी स्त्री से बोला ॥ ४ ॥

राजा दृढ़धन्वा बोला – अयि सुन्दरी! राग, द्वेष, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य इन छ शत्रुओं से युक्त, गन्धर्व नगर के समान इस असार संसार में मनुष्यों को क्या सुख है? ॥ ५ ॥

कीट विष्टा भस्म रूप और वात पित्त कफ इनसे युक्त मल, मूत्र, रक्त से व्यप्त ऐसे इस शरीर से मेरा क्या प्रयोजन है ॥ ६ ॥

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