अध्याय २७

वह अत्यन्त दुर्बल कदर्य उस वाटिका के फलों को आनन्द से अच्छी तरह भोजन करता और लोभवश बचे हुए फलों को बेंच देता था ॥ ५५ ॥

निर्भय पूर्वक उस बगीचा के फलों को बेंचकर सब धन स्वयं ले लेता था। जब माली पूछता था तो उसके सामने झूठ बोलता था कि ॥ ५६ ॥

नगर मैं फिरता-फिरता, भिक्षा माँगता-माँगता और खाता-खाता तुम्हारे वन की रक्षा करता हूँ ॥ ५७ ॥

तत्फलानि कदर्यस्तु जघास निर्भरं मुदा ॥ व्यक्रीणतावशिष्टानि लोभेनातीव दुर्बलः ॥ ५५ ॥

अगृह्णाद्‌द्रविणं तज्जं सर्वं स्वयमशङ्कितः ॥ यदाऽपृच्छद्वनाधीशस्तदग्रेऽवीवदन्मृषा ॥ ५६ ॥

भ्रामं भ्रामं च नगरं याचं याचं च भैक्षकम्‌ ॥ घासं घासं दिवारात्रौ परिचर्यामिते वनम्‌ ॥ ५७ ॥

तथाप्यस्य फलान्याशन्मासं गच्छन्ति पक्षिणः ॥ पश्याश्न न्तो मया केचिन्नाशिताः खचरा भृशम्‌ ॥ ५८ ॥

तेषां मांसानि पक्षाणि पतितानीह सर्वतः ॥ तद्‌दृष्ट्वाऽतीव विश्वास्य जगाम वाटिकापतिः ॥ ५९ ॥

एवं प्रवर्तमानस्य जग्मुर्वर्षाणि दुर्मतेः ॥ सप्ताशीतिः कदर्यस्य जराजर्जरितस्ततः ॥ ६० ॥

फिर भी पक्षीगण इस बगीचे के फलों को महीने में आकर खा जाते हैं। देखिये, मैंने कुछ खाते हुए पक्षियों को अच्छी तरह से मार डाला है ॥ ५८ ॥

यहाँ चारों तरफ उन पक्षियों के मांस और पंख गिरे पड़े हैं उन मांस के टुकड़ों को और पंखों को देखकर उसका अत्यन्त विश्वा स कर माली चला गया ॥ ५९ ॥

इस प्रकार अत्यन्त जर्जर उस दुष्ट कदर्य के वास करते ८७ (सत्तासी) वर्ष व्यतीत हो गये। बाद ॥ ६० ॥

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