अध्याय २७

वह मूढ़ वहाँ ही मर गया और उसको अग्नि और काष्ठ भी नहीं मिला। बिना भोगे पापों का नाश नहीं होता है ऐसा वेद के जानने वाले कहते हैं ॥ ६१ ॥

इस कारण हाहाकार करता हुआ यमद्रूतों के मुद्‌गर के आघात से पीड़ित कष्ट के साथ अत्यन्त भयंकर दीर्घ मार्ग को गया ॥ ६२ ॥

पूर्व में किये हुए कर्मों को स्मरण करता हुआ और प्रलाप करता हुआ तथा बुद्‌बुद‌ अक्षरों में कहता हुआ कि अहो! आश्चर्य है। मुझ दुष्ट कदर्य के अज्ञान को देखिये ॥ ६३ ॥

ममार मूढधीरेतत्र नैवाप वह्निदारुणी ॥ नाभुक्तं  क्षीयते पापमिति वेदविदोऽवदन्‌ ॥ ६१ ॥

तस्माद्धाहा प्रकुर्वाणे मुद्गराघातपीडितः ॥ अजीगमन्महामार्गं कृच्छ्रेणातिविभीषणम्‌ ॥ ६२ ॥

स्मरन्‌ पूर्वकृतं कर्म प्रलपन्‌ बुद्‌बुदाक्षरम्‌ ॥ अहो मे पश्यताज्ञानं कदर्यस्य च दुर्मतेः ॥ ६३ ॥

आसाद्य मानुषं देहं दुर्लभं त्रिदशैरपि ॥ खण्डेऽस्मिन्‌ भारते पुण्ये कृष्णसारमृगान्विते ॥ ६४ ॥

किं कृतं धनलोभेन व्यर्थं नीतं जनुर्मया ॥ तद्धनं तु पराधीनं चिरकालार्जितं मया ॥ ६५ ॥

किं करोमि पराधीनः कालपाशावृतोऽधुना ॥ मानुषं जनुरासाद्य न किञ्चित्‌ कृतवान्‌ शुभम्‌ ॥ ६६ ॥

कृष्णसार से युक्त पवित्र इस भारतखण्ड में देवताओं को भी दुर्लभ मनुष्य शरीर को प्राप्त कर ॥ ६४ ॥

मैंने धन के लोभ से क्या किया? अर्थात्‌ कुछ भी नहीं किया और मैंने जन्म व्यर्थ में खोया तथा मैंने बहुत दिनों में जो धन संचय किया था वह धन तो पराधीन हो गया ॥ ६५ ॥

इस समय कालपाश में बँधा पराधीन होकर क्या करूँ? प्रथम मनुष्य शरीर को प्राप्त कर कुछ भी पुण्यकर्म नहीं किया ॥ ६६ ॥

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