अध्याय २७

न तो दान दिया, न अग्नि में आहुति दी, न हिमालय की गुफा में जाकर तपस्या की, मकर के सूर्य होने पर माघ मास में न गंगा के जल का सेवन किया ॥ ६७ ॥

पुरुषोत्तम मास के अन्त में तीन दिन उपवास भी नहीं किया और कार्तिक मास में तारागण के रहते प्रातः स्नान नहीं किया ॥ ६८ ॥

मैंने पुरुषार्थ को देनेवाले मनुष्य शरीर को भी पुष्ट नहीं किया। अहो! आश्चर्य है। मेरा संचित धन पृथिवी में निरर्थक गड़ा रह गया ॥ ६९ ॥

न दत्तं न हुतं वह्नौ न तप्तं  हिमगह्वरे ॥ न गाङ्गं सेवितं तोयं माघे मकरगे रवौ ॥ ६७ ॥

उपवासत्रयं चान्ते न कृतं पुरुषोत्तमे ॥ न कृतं कार्तिके प्रातःस्नानं सतारकागणम्‌ ॥ ६८ ॥

न पुष्टश्च मया देहो मानुषः पुरुषार्थदः ॥ अहो ये सञ्चितं द्रव्यं स्थितं भूमौ निरर्थकम्‌ ॥ ६९ ॥

जीवो जीवनपर्यन्तं क्लेशितो दुष्टबुद्धिना ॥ कदाचिज्जाठरो वह्निर्नान्नैरनिर्वापितो मया ॥ ७० ॥

नापि सद्वसनाच्छन्नः स्वदेहः पर्वणि क्कचित्‌ ॥ न ज्ञातयो बान्धवाश्च स्वजना न स्वसा अपि ॥ ७१ ॥

जामाता च सुता वापि पिता माताऽनुजास्तथा ॥ पतिव्रताऽपि गृहिणी ब्राह्मणा नैव तोषिताः ॥ ७२ ॥

दुष्ट बुद्धि होने के कारण जीवनपर्यन्त जीव को कष्ट दिया और मैंने जठराग्नि को भी कभी अन्न से तृप्त नहीं किया ॥ ७० ॥

किसी पर्व के समय भी उत्तम वस्त्र से शरीर को आच्छादित नहीं किया। न तो जाति के लोगों को, न बान्धवों को, न स्वजनों को, न बहिनों को ॥ ७१ ॥

न दामाद को, न कन्या को, न पिता-माता, छोटे भाई को, न पतिव्रता स्त्री को, न ब्राह्मणों को प्रसन्न किया ॥ ७२ ॥

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