अध्याय २७

इन लोगों को एक बार भी मिठाई से कभी तृप्त नहीं किया। इस प्रकार विलाप करते हुए उस कदर्य को यमदूत यमराज के समीप ले गये ॥ ७३ ॥

उसको देखकर चित्रगुप्त ने उसके पाप-पुण्य को देखा और अपने स्वामी धर्मराज से कहा कि हे महाराज! यह ब्राह्मणों में अधम कृपण है ॥ ७४ ॥

धन के लोभी इस दुष्ट कदर्य का कुछ भी पुण्य नहीं है। वाटिका में रह कर इसने बहुत पाप किया है ॥ ७५ ॥

मिष्ठान्नै नेकवारं च तर्पिता न मया क्कचित्‌ ॥ एवं विलपमानं तं निन्युः कीनाशसन्निधिम्‌ ॥ ७३ ॥

तं दृष्ट्वा चित्रगुप्तस्तु विलोक्यैतच्छुभाशुभम्‌ ॥ अवोचत्‌ स्वामिनं धर्मं कदर्योऽयं द्विजाधमः ॥ ७४ ॥

न किञ्चित्‌ सुकृतं त्वस्य धनुलुब्धस्य दुर्मतेः ॥ असावचीकरत्‌ पापं पुष्कलं वाटिकास्थितः ॥ ७५ ॥

अचूचुरत्‌ फलान्यद्धा विश्वस्तो वाटिकापतेः ॥ ततो जघास तान्येव पक्कानि यानि यानि च ॥ ७६ ॥

व्यक्रीणादवशिष्टानि धनलोभेन दुर्मतिः ॥ फलचौर्यकृतं पापं विश्वासघातजं परम्‌ ॥ ७७ ॥

एतत्पापद्वयं चास्मिन्नत्युग्रं वर्तते प्रभो ॥ अन्यान्यपि च पापानि सन्त्यस्मिन्‌ विविधानि च ॥ ७८ ॥

माली का विश्वा्सपात्र बन कर साक्षात्‌ स्वयं फलों को चोराया और जो-जो पके हुए फल थे उनको खाया ॥ ७६ ॥

और जो खाने से बचे हुए फल थे उनको इस दुष्ट ने धन के लोभ से बेच डाला। एक फलों के चोरी का पाप, दूसरा विश्वाखसघात का पाप ॥ ७७ ॥

हे प्रभो! ये दो पाप इस कृपण में अत्यन्त उग्र हैं और भी इसमें कई प्रकार के अनेक पाप हैं ॥ ७८ ॥

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