अध्याय २७

हे वरारोहे! अध्रुव शरीर से ध्रुववस्तु एकत्रित करने के लिये पुरुषोत्तम का स्मरण कर वन को जाता हूँ ॥ ७ ॥

तब वह गुणसुन्दरी ऐसा सुन के विनय से नम्रता युक्त तथा शुद्धता से हाथ जोड़ अपने पति से बोली ॥ ८ ॥

गुणसुन्दरी बोली – हे नृपते! मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगी, पतिव्रता स्त्रियों के पति ही देवता हैं ॥ ९ ॥

अध्रुवेण शरीरेण ध्रुवमर्जयितुं वने ॥ गमिष्यामि वरारोहे संस्मरन्पुरुषोत्तम्‌ ॥ ७ ॥

तदाकर्ण्य प्रिया प्राह साध्वी सा गुणसुंदरी ॥ विनयावनता भूत्वा बद्धांजलिपुटा शुचा ॥ ८ ॥

गुणसुंदर्युवाच ॥ अहमप्यागमिष्यामि त्वयैव सह भूपते ॥ पतिव्रतानां स्त्रीणां तु पतिरेव हि दैवतम्‌ ॥ ९ ॥

पत्यौ गते तु या नारी गृहे तिष्ठति सौनवे ॥ स्नुषाधीना तु सा नारी शुनीव परवेश्मनि ॥ १० ॥

मितं पिता ददात्येव मितं भ्राता मितं सुतः ॥ अमितस्य प्रदातारं भर्तारं का नु न व्रजेत्‌ ॥ ११ ॥

ऊरीकृत्य प्रियावाक्यं सुतं राज्येभिषिच्य च ॥ सहपत्न्या् ययौशीघ्रमरण्यं मुनिसेवितम्‌ ॥ १२ ॥

जो स्त्री पति के जाने पर पुत्र के गृह में रहती है, वह स्त्री पुत्रवधू के आधीन हो पराये गृह में कुत्ते के समान रहती है ॥ १० ॥

पिता स्वल्प देता है और भाई भी स्वल्प ही देता है अत्यन्त देवेवाले पति के साथ कौन स्त्री न जायगी? ॥ ११ ॥

इस प्रकार प्रिया की बात को स्वीकार कर पुत्र का अभिषेक कर स्त्री सहित शीघ्र ही मुनियों से सेवित वन को गया ॥ १२ ॥

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