अध्याय २७

दोनों स्त्री-पुरुष हिमालय के समीप गंगाजी के निकट जाकर पुरुषोत्तम मास के आनेपर दोनों काल में स्नान करने लगे ॥ १३ ॥

हे नारद! वहाँ पुरुषोत्तम मास को प्राप्त कर विधि से पुरुषोत्तम का स्मरण कर भार्या सहित तपस्या करने लगे ॥ १४ ॥

ऊपर हाथ किये बिना अवलम्ब पैर के अंगूठे पर स्थिर आकाश में दृष्टि लगाये निराहार होकर राजा श्रीकृष्ण का जप करने लगे ॥ १५ ॥

हिमाचलसमीपे च गंगामासाद्य दंपती ॥ त्रिकालं चक्रतुः स्नानं संप्राप्तेा पुरुषोत्तमे ॥ १३ ॥

पुरुषोत्तमं समासाद्य विधिना तत्र नारद ॥ तपस्तेपे सपत्नीकः संस्मरन्पुरुषोत्तमम्‌ ॥ १४ ॥

ऊर्ध्वबाहुनिरालंबःपादांगुष्ठेन संस्थितः ॥ नभोदृष्टिनिराहारः श्रीकृष्णं तमजीजपत्‌ ॥ १५ ॥

एवं व्रतविधौ तस्य तस्थुषश्च तपोनिधेः ॥ सेवाविधौ प्रसन्नासीन्महिषी सा पतिव्रता ॥ १६ ॥

एवं कृतवतस्तस्य संपूर्णे पुरुषोत्तमे ॥ विमानमगमत्तत्र किंकिणीजालमंडितम्‌ ॥ १७ ॥

पुण्यशीलसुशीलाभ्यां सेवितं सहसागतम्‌ ॥ तद्‌दृष्ट्वा विस्मयाविष्टः सपत्नी को महीपतिः ॥ १८ ॥

इस प्रकार व्रत की विधि में स्थित हुए तपोनिधि राजा की पतिव्रता रानी सेवा में तत्पर हुई ॥ १६ ॥

इस प्रकार तप करते हुए राजा का पुरुषोत्तम मास सम्पूर्ण होने पर घंटिमाओं के जल से विभूषित विमान वहाँ आया ॥ १७ ॥

ऐसे तत्काल आये हुए पुण्यशील और सुशील सेवित विमान को देख स्त्री सहित राजा आश्चर्य युक्त हो ॥ १८ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14