अध्याय २७

विमान में बैठे हुए पुण्यशील और सुशील को नमस्कार किया। पुनः वे स्त्री सहित राजा को विमान में बैठने की आज्ञा दिये ॥ १९ ॥

स्त्री सहित राजा विमान में बैठ के सुन्दर नवीन शरीर धारण कर तत्काल गोलोक को गये ॥ २० ॥

इस प्रकार पुरुषोत्तम मास में तप करके भय रहित लोक को प्राप्त होकर हरि के निकट आनन्द करने लगे ॥ २१ ॥

अनीनमद्विमानस्थौ पुण्यशीलसुशीलकौ ॥ ततस्तौ तं सपत्नी कं विमानं निन्यतुर्नृपम्‌ ॥ १९ ॥

विमानमधिरुह्याथ सपत्नीशको नराधिपः ॥ गोलोकं गतवाञ्छीकघ्रं दिव्यं धृत्वा वपुर्नवम्‌ ॥ २० ॥

एवं तप्त्वा् तपो राजा मासे श्रीपुरुषोत्तमे ॥ निर्भयं लोकमासाद्य मुमोद हरिसन्निधौ ॥ २१ ॥

पतिव्रता च तत्पत्नीा सापि तल्लोरकमाययौ ॥ पुरुषोत्तमे तपस्यन्तं संसेव्य निजवल्लौभम्‌ ॥ २२ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ वर्णयामि किमद्याहं यदेकरसना मम ॥ पुरुषोत्तमसमं किंचिन्नास्ति नारद भूतले ॥ २३ ॥

सहस्रजन्मतप्तेन तपसा यन्न गम्यते ॥ तत्फलं गम्यते पुम्भिः पुरुषोत्तमसेवनात्‌ ॥ २४ ॥

और पतिव्रता स्त्री भी पुरुषोत्तम में तप करते हुए पति की सेवा कर उसी लोक को प्राप्त हुई ॥ २२ ॥

श्रीनारायण बोले – हे नारद! मेरी एक जिह्वा है इस समय इसका क्या वर्णन करूँ? इस पृथ्वी पर पुरुषोत्तम के समान कुछ भी नहीं है ॥ २३ ॥

सहस्र जन्म में तप करने से जो फल प्राप्त नहीं होता है वह फल पुरुषोत्तम के सेवन से पुरुष को प्राप्त हो जाता है ॥ २४ ॥

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